03/04/2024
मध्यकालीन इतिहासकार और कवि अमीर खुसरो ने कभी कहा था कि, "सुल्तान के ताज का हर मोती गरीब किसान के गिरे आंसुओं का एक - एक कतरा है।" हज़रत अमीर खुसरो को गुज़रे सात सदियां बीत चुकी हैं और झेलम में काफी पानी भी बह चुका है लेकिन आज भी घाटी के बाशिंदों की नियति वही है जो मध्यकालीन गंगा- यमुना के दोआबा में आम किसानों की थी। चार- पांच दिन किसी भी नतीजे पर पहुंचने के लिए बहुत कम होते हैं लेकिन २१वीं सदी के हुज़ूर- ए- हिंदुस्तान को सचेत हो जाना चाहिए की पीर पंजाल और बृहद हिमालय की घाटियों में हम एक ज्वालामुखी के ऊपर बैठे हैं और अगर आप यह समझते हैं कि संगीनों के साए में उनकी आवाज को दबा सकते हैं तो इससे आप 'हर कफ़न पर लिख दो आज़ादी" या "One Solution, Gun Solution" नैरेटिव को और मजबूत कर रहे होते हैं।
अगर आपको इस देश से प्यार है तो ऐसा नहीं हो सकता की जिसको आप अपना घर कहते हैं, उसी घर के एक हिस्से के पर आप कब्ज़ा जमाया बैठे हो और वहां के स्थानीय बाशिंदों को अपने ही घर में घुसने के लिए आईडी प्रूफ दिखाना पड़ता हो।
Akhilesh Kumar