27/08/2026
कश्ती, समंदर और हौसले की कहानी
तहलका लहरों का था, लेकिन मेरी कश्ती खामोश थी। हवाओं का जोर था, रास्ते कठिन थे और चारों तरफ चुनौतियों का समंदर था। फिर भी उस कश्ती के भीतर एक अजीब-सी सरफरोशी थी—कुछ कर गुजरने का जुनून और मंज़िल तक पहुँचने का विश्वास।
राह आसान नहीं थी। हर कदम पर तूफान सामने खड़ा था, लेकिन कश्ती ने हार मानना नहीं सीखा था। वह खुद अपना रास्ता तराश रही थी। न कोई शिकायत थी, न निराशा। उफनते समंदर की लहरें जितनी तेज होतीं, उसका हौसला उतना ही मजबूत होता जाता।
सबसे बड़ी बात यह थी कि ना कोई माँझी था और ना ही कोई पतवार। फिर भी कश्ती निडर थी और जीत के लिए तैयार थी। उसे पता था कि मंज़िल पाने के लिए हमेशा किसी सहारे की जरूरत नहीं होती; कभी-कभी इंसान का आत्मविश्वास ही उसकी सबसे बड़ी पतवार बन जाता है।
संघर्ष लंबा था, लेकिन विश्वास उससे भी बड़ा था। हर तूफान के बाद किनारा करीब आता गया। आखिर वह दिन भी आने वाला था जब किनारों पर जश्न की बस्ती बसती और वही कश्ती, जो कभी तूफानों से घिरी थी, समंदर की अपनी एक अलग हस्ती बनने वाली थी।
क्योंकि जीत उन्हीं की होती है, जो तूफानों से डरकर कश्ती रोक नहीं देते, बल्कि लहरों को चीरकर अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते रहते हैं।