14/04/2025
"कभी हंसी उड़ाई गई थी... आज सम्मान से नाम लिया जाता है…"
एक वक्त था, जब मैं सिर्फ सपना देखता था…
समाज के लिए कुछ करने का, कुछ बदलने का।
पर तब लोग मेरा सपना नहीं, मुझ पर हँसते थे।
कहते थे – "क्या करेगा ये? कौन पूछेगा इसे?"
पर मैंने किसी की बातों को जवाब नहीं दिया…
मैंने अपने कर्म से जवाब दिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक छोटा बाल स्वयंसेवक बना,
हर सुबह 4 बजे उठकर शाखा गया।
लोग सोते रहे… और मैं संस्कार, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति सीखता रहा।
गठनायक बना, गठशिक्षक बना, शाखा कार्यवाह बना –
हर ज़िम्मेदारी को पूरे मन से निभाया।
फिर संगठन ने कहा –
"अब विश्व हिंदू परिषद में सेवा करो…"
मैंने वहां भी कोई सवाल नहीं किया,
बस मातृभूमि और धर्म के लिए काम करना शुरू कर दिया।
गौ माता की रक्षा हो,
गरीब असहाय की सेवा हो,
या कोरोना काल में लोगों की जान बचाना हो –
मैंने हर ज़रूरतमंद को अपना समझा।
500 से ज़्यादा लोगों को मौत के मुँह से निकाला,
रक्तदान कर ज़िंदगी दी…
गरीब को खाना, बुज़ुर्ग को सहारा, पीड़ित को न्याय दिया।
और बदले में कुछ नहीं माँगा… सिर्फ आशीर्वाद और मुस्कान।
आज लोग कहते हैं –
"इस उम्र में इतना काम? ये कैसे कर लिया?"
तो मैं मुस्कुरा कर कहता हूँ –
"कर्म और चरित्र अगर सच्चा हो,
तो उम्र कभी रास्ता नहीं रोकती।"
आज वही लोग जो कभी हँसते थे,
आज मेरे साथ खड़े हैं,
क्योंकि अब उन्हें दिखता है – ये पागलपन नहीं था…
ये तो एक सपना था,
जो आज हक़ीक़त बन चुका है।
"अगर आपका दिल साफ है, इरादा सच्चा है और कर्म निरंतर है…
तो आप अकेले चलकर भी बहुतों की दिशा बदल सकते हैं।"