17/08/2025
🔥 * #वाचालता की #निरर्थकता*
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👉 *आज #वक्ता बहुत बढ़ गये हैं और साथ ही वाचालता भी, पर देखा यह गया है कि अपने #स्वार्थ की कोई बात भले ही मान ले पर ऐसी कोई बात उनकी न सुनी मानी जायगी, जिसमें सुनने वाले को कोई कष्ट या नुकसान दीखता हो। #राजनैतिक व्याख्यानदाता असंतोष उभारकर कोई बढ़ी चढ़ी माँगें करने, #हड़ताल कराने, लड़ाने के लिए श्रोताओं को तत्पर कर सकते हैं पर #जुआ, #नशा, #सिनेमा, #आलस्य, असंयम, स्वार्थ, #कुविचार, दुर्भाव, दुस्वभाव आदि छोड़ने के लिए प्रस्तुत नहीं कर पाते क्योंकि मनुष्य स्वार्थ, #संकीर्णता एवं बुराई को बड़ी कठिनाई से ही छोड़ता है। उसे छुड़ाने के लिए उच्चकोटि के #श्रेष्ठ #संस्कार वाले व्यक्ति ही सफल होते हैं क्योंकि वे वाणी से नहीं अपने #आचरण एवं व्यक्तित्व से दूसरों को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार के ठोस प्रभाव से प्रभावित व्यक्ति ही अपने में #सुधार या त्याग कर सकने की प्रेरणा से प्रभावित करते हैं। वाणी की चतुरता से प्रभावित करने की कला अब जनता द्वारा एक प्रकार से वेश्या नृत्य की तरह तिरस्कृत एवं बहिष्कृत ही की जा रही है। लोग उससे कुछ मनोरंजन भले ही कर लें, अपने में कोई ठोस परिवर्तन तब तक नहीं करेंगे जब तक वक्ता के व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रभावित न हों। यह तथ्य जितना #सामाजिक क्षेत्र में लागू होता है उतना ही पारिवारिक क्षेत्र में भी हम चाहते हैं। कि हमारे परिजन, स्त्री, बच्चे हमारा कहना मानें, अनुकूल आचरण करें और उस रास्ते पर चलें जिस पर हम चलाना चाहते हैं तो उनके सामने अपना आचरण भी प्रस्तुत करना पड़ेगा। ठीक है समझाना-बुझाना भी उचित और आवश्यक है यदि तर्क प्रमाण और उदाहरणों के साथ कोई बिना लाग-लपेट की बात सीधे ढंग से समझाई जाय तो उसका कुछ न कुछ प्रभाव भी पड़ता है और #परिणाम भी निकलता है पर हृदय, #स्वभाव, #विचार और #भाव #परिवर्तन जैसी कोई बड़ी बात किसी से कराने के लिए सबसे कारगर उपाय यही है कि हम अपने आपको बदलें, सुधारें और अपने #उत्कृष्ट #व्यक्तित्व की छाप अपने अनुयायियों पर छोड़ें जलते हुए #दीपक से दूसरे दीपक जलाये जाते हैं। जो स्वयं ही बुझा पड़ा है वह दूसरों में #प्रकाश कैसे उत्पन्न करेगा?*
*✍️पं. श्रीराम शर्मा आचार्य*