24/06/2026
इस रविवार दिनांक 21 june 2026 को DBM Insight Series के विशेष सत्र में हमारे बीच ISKCON के सम्माननीय संत सत्य स्वरूप दास जी उपस्थित रहे। विषय था— भक्ति योग, ज्ञान योग एवं कर्म योग।
जीवन में अधिकांश लोग शिक्षा प्राप्त करते हैं, करियर बनाते हैं, सफलता का पीछा करते हैं और समाज द्वारा निर्धारित उपलब्धियों को हासिल करने का प्रयास करते हैं। परंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इन सबके बीच एक प्रश्न को छोड़ नहीं पाते—
मैं कौन हूँ?
मैं यहाँ क्यों हूँ?
और जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
इन्हीं गहन प्रश्नों के उत्तर खोजने की दिशा में सत्य स्वरूप दास जी ने भक्ति योग, ज्ञान योग एवं कर्म योग के माध्यम से जीवन को समझने का सरल एवं व्यावहारिक मार्ग प्रस्तुत किया।
उन्होंने बताया कि भक्ति योग ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का मार्ग है, ज्ञान योग आत्मबोध और सत्य की खोज का मार्ग है, जबकि कर्म योग निःस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा देता है।
सत्र के दौरान उन्होंने एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए जीवन का त्याग करना आवश्यक नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपने वर्तमान दायित्वों और कार्यक्षेत्र में रहते हुए भी भगवद्गीता के सिद्धांतों को अपनाकर एक सफल, संतुलित और प्रेरणादायक जीवन जी सकता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि यदि कोई किसान है, तो वह खेती करते हुए भी भगवद्गीता के ज्ञान को अपने जीवन में उतार सकता है। इससे वह न केवल अपने कार्य में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र में रहते हुए आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाकर अपने जीवन और कार्य को अधिक सार्थक बना सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि हर व्यक्ति मोंक नहीं बन सकता, हर व्यक्ति शिक्षक नहीं बन सकता, परंतु समाज में कुछ लोगों का आध्यात्मिक ज्ञान के संरक्षण और प्रसार के लिए समर्पित होना आवश्यक है। ऐसे ही लोग भक्ति, ज्ञान और कर्म के सिद्धांतों को समाज तक पहुँचाते हैं तथा आने वाली पीढ़ियों को सही दिशा प्रदान करते हैं।
सत्य स्वरूप दास जी ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि भक्ति योग, ज्ञान योग और कर्म योग तीन अलग-अलग मार्ग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। इन तीनों का अंतिम लक्ष्य व्यक्ति के जीवन को सार्थक बनाना, आत्मिक उन्नति करना तथा मानवता के कल्याण में योगदान देना है।
उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसान हो, छात्र हो, शिक्षक हो, इंजीनियर हो, व्यवसायी हो या किसी अन्य क्षेत्र में कार्यरत हो, यदि वह इन तीनों सिद्धांतों को अपने जीवन के मूल्यों और उद्देश्य का आधार बना ले, तो वह न केवल अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है, बल्कि जनकल्याण, राष्ट्रनिर्माण और मानवता की सेवा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। ऐसे जीवन-दृष्टिकोण से व्यक्ति के भीतर निहित असीमित क्षमताएँ जागृत होती हैं और उसका जीवन स्वयं दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है।
यह सत्र केवल योग के विभिन्न मार्गों की चर्चा नहीं था, बल्कि जीवन के उद्देश्य, आत्मबोध और कर्म को आध्यात्मिकता से जोड़ने की एक प्रेरणादायक यात्रा थी।
सत्य स्वरूप दास जी के विचारों ने सभी प्रतिभागियों को यह संदेश दिया कि आध्यात्मिकता का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन को उच्च मूल्यों से जोड़ना है।
जय हिन्द! 🇮🇳