28/04/2026
ओडिशा में एक भाई ने अपनी बहन के कंकाल को कंधे पर उठाकर 3 किलोमीटर दूर बैंक तक पहुंचाया। आमतौर पर यह कहानी यहीं समाप्त हो जानी चाहिए थी, लेकिन असली कहानी तो यहीं से शुरू होती है।
बैंक के अधिकारियों ने उसे सूचित किया कि वह अपनी मृत बहन के खाते से 19-20 हजार रुपये तभी निकाल सकता है जब वह स्वयं उपस्थित हो। भाई को कागजी कार्यवाही और नियमों की समझ नहीं थी, लेकिन वह जानता था कि अपनी बहन के द्वारा कमाए गए पैसे का उपयोग करना आवश्यक है।
यह घटना इस बात का प्रमाण है कि भारत में सिस्टम की फाइल में जीवित होना मृत्यु से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां क्लर्क की कुर्सी और उनके द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का प्रभाव मृत्यु प्रमाण पत्र से अधिक होता है।
वास्तव में, यह घटना सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करती है, जहां इंसान के पास सही कागजात, भाषा और साधन नहीं होने पर न्याय की प्राप्ति मुश्किल हो जाती है।
इस घटना को विचित्र खबर के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रश्न के रूप में देखें: "कब तक सिस्टम इंसान से बड़ा रहेगा?"