Gic Mathkuri Sain Hindaw Tehri Garhwal

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आज यों ही मन हुआ कि मोबाइल की gallery को टटोला जाए। देखें, तो इस आधुनिक यंत्र ने हमारे किन किन क्षणों को संभाल कर रखा हु...
26/05/2025

आज यों ही मन हुआ कि मोबाइल की gallery को टटोला जाए। देखें, तो इस आधुनिक यंत्र ने हमारे किन किन क्षणों को संभाल कर रखा हुआ है.. टटोलने पर कुछ पुरानी तस्वीरें मिली, तो यकायक मेरा दिल उस पुराने समय में जा पहुंचा जहाँ मैंने, आपने, हम सभी ने कभी अपनी जिंदगी का सबसे अहम और खूबसूरत सा लम्हा जिया है - 'मथकुड़ी सैंण' । मन हुआ यदि वश में होता तो घड़ी की सुइयों से ठहर जाने की याचना करते और लौट आते उस बड़े से मैदान में, उस मैदान की उन सीढ़ियों में, उन कक्षाओं में। ले चलते अपने पुराने सहपाठियों को, अपने अध्यापकों को भी, और फिरसे दोहराते वह सब यादें जो अब बार बार हमें परेशान किया करती हैं। एक बार फिर समेट लेते उन तमाम एहसासों को, जो बस अब हमारे मोबाइल कि galleries में कहीं पड़ी हुईं हैं। और एक बार फिर से जी लेते अपनी असल जिंदगी को, जो अब कहीं बिखरी पड़ी है उस मैदान कि मिट्टी में, उन सीढ़ियों में, उन कक्षाओं कि दीवारों के कोनों में।

जरा अपनी नजरों को घुमाइये तो! कुछ कोंपलें पुनः उग आयीं हैं, विद्यालय में बसंत का पुनः आगमन हुआ है। रंग बिरंगे फूल पुनः ख...
22/02/2021

जरा अपनी नजरों को घुमाइये तो! कुछ कोंपलें पुनः उग आयीं हैं, विद्यालय में बसंत का पुनः आगमन हुआ है। रंग बिरंगे फूल पुनः खिलकर अपने संग बसंत रूपी बहार ले आये हैं। नयी कलियां एकबार पुनः उग आयीं हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सदियों से बाहें फैलाये पतझड़ शायद ही बसंत को पुनः लौटने दे और पतझड़ के सन्नाटे कि ध्वनि ने तो मानो कानों की श्रवण शक्ति को ही शून्य कर दिया हो। परंतु अब सारी खोयी शक्तियां मानों शरीर में पुनः प्रवेश कर रही हों। विद्यालय भी पुनः ऐसे खिल उठे हैं जैसे उनकी की आत्मा पुनः विद्यालय को लौट आयी हो। सचमुच बीते दिनों में वीरान विद्यालयों को देख हृदय करुण क्रंदन करता और वही हृदय आज ऐसा प्रतीत हो रहा मानो संसार के सारे सुख उसे प्राप्त हो गए हों। जो कठिन समय बीत गया आशा उसकी छाया का अंशमात्र भी दोबारा विद्यालय को वीरान न करे और विद्यार्थियों की रौनक से सदा परिपूर्ण रहे।

चाँद देखते हो आसमान में?जाहिर सी बात है सभी देखते हैं। साथ ही आसमान में कितने सारे सितारे भी दृष्टिगत होते हैं लेकिन, उन...
02/10/2020

चाँद देखते हो आसमान में?
जाहिर सी बात है सभी देखते हैं। साथ ही आसमान में कितने सारे सितारे भी दृष्टिगत होते हैं लेकिन, उन अनगिनत सितारों के बीच चाँद कुछ अकेला सा प्रतीत होता है। कहने को तो चंद्रमा चारों और से सितारों की चादर से घिरा होता है परंतु, वास्तविकता में चाँद सिर्फ अकेला है।
कुछ इसी प्रकार की स्थिति सी है हमारी। कहने को तो दुनिया भरी है लोगों से परंतु, वास्तविकता में हम खुद को उस चाँद की भांति अकेली पाती हैं अनगिनत लोगों के मध्य।
यहाँ तक की जहाँ चार लोग भी यदि समूह में दिखाई दें तो हृदय में भय उत्पन्न हो जाता है, न जाने वह समूह हमारे साथ किस प्रकार का व्यवहार करेगा।
चारों ओर भय का वातावरण होता है। ना ही कोई निश्चित उम्र है हमारी सुरक्षित रहने की। कभी इस धरती पर आने से ही रोक लिया जाता है। यदि जीवन मिल भी जाए तो बालपन से ही प्रताड़नायें आरम्भ हो जाती हैं जो आजीवन चलती रहती हैं। न प्रश्न पूछने का अधिकार है और न ही इस जगत में स्वछंद जीवन जीने का अधिकार ही है। जीवन अकसर मृतप्रायः हो जाता है जब रक्षक ही भक्षक बन जाता है।
शायद इस स्त्री जीवन का कोई मूल्य ही नहीं। कोई भी आकर दुष्कर्म करके चला जाता है। अपराधी के पक्ष में यह समाज मूक बना खड़ा रहता है और पीड़िता को आजीवन तंज कसता है। न जाने यह कौन सा न्याय है जहाँ हमें ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। इस दृश्य को देख आत्मा छलनी सी हो जाती है और वेदनाएं तो हृदय को चीर देती हैं। असहनीय पीड़ा होती है परंतु, यह करुण क्रंदन किसी को सुनाई नहीं देता।
हमारा जीवन सदैव के लिए परिवर्तित हो जाता है और हमारी पहचान भी कहीं खो जाती है परंतु, इस हमारी इस अवस्था के अंगारों में भी कुछ मनुष्यों को अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने का अवसर प्राप्त हो जाता है। कोई जातिवाद को बीच में लाता है। वे लोग शायद यह नहीं जानते, जाति कोई भी हो स्त्री तो स्त्री ही होती है। वेदना सबकी एक ही प्रकार की होती है। शरीर भी एक ही प्रकार का होता है और पीड़ा भी एक ही प्रकार की होती है।
कुछ क्षण हमारी लाचार अवस्था के लिये कहीं किसी छोर से कुछ ध्वनियां सुनाई देती हैं। आशा की किरण सी दृष्टिगत होने लगती है परंतु, कुछ क्षणों के उपरांत वे भी समाप्त हो जाती हैं और हमारा जीवन पुनः उसी अंधकार में परिवर्तित हो जाता है।

समय का चक्र भी कितना अजीब होता है। कभी समय इतना कम होता है स्वयं के लिए भी क्षण भर तक का समय नहीं मिल पाता और कभी इतना स...
26/09/2020

समय का चक्र भी कितना अजीब होता है। कभी समय इतना कम होता है स्वयं के लिए भी क्षण भर तक का समय नहीं मिल पाता और कभी इतना समय होता है कि समय व्यतीत करना ही कठिन हो जाता है। कभी अच्छा समय तो कभी बुरा समय। कभी रोमांचक तो कभी भयावह। समय के इतने रूप होते हैं कि हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते की भविष्य में समय का कौन सा रूप जीवन के द्वार पर दस्तक देगा।
समय यदि हमारे अनुकूल हो तो हम सहज स्वीकार कर लेते हैं और उस समय को कैद करने का प्रयत्न करने हैं परंतु, समय की धारा को कोई कैसे रोक सकता है। समय यदि हमारे अनुकूल न हो तो चाहते हैं यह समय शीघ्र व्यतीत हो जाना चाहिए परंतु, समय तो अपनी गति के अनुसार ही चलता है।
ऐसा ही समय वर्तमान में संपूर्ण विश्व के समक्ष है। जिसे प्रत्येक मानव शीघ्रातिशीघ्र पीछे छोड़ देना चाहता है और समय की धारा में आगे निकल जाना चाहता है। यह सोचना जितना सहज है वास्तविकता उतनी ही कठिन है। फिर भी मानव समूह प्रयत्नों में जुटे हैं ताकि समस्त मानव जाति को इस समय से मुक्त करने में सफल हों और जीवन पूर्व की भांति सामान्य हो सके।
जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती आशा है हमारे विद्यार्थी अपने घरों से ही अपनी पढाई को निरंतर जारी रखेंगे एवं अध्यापक भी विद्यार्थियों की हर संभव सहायता करेंगे।
आशा है यह समय भविष्य के लिये कुछ सीख हमें अवश्य सिखायेगा जो हमें इस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करने में दृढ़ बनायेंगी।

मानव जीवन में वृद्धावस्था एक ऐसी घड़ी आती है जब मानव का शरीर जीर्ण-क्षीण एवं जर्जर अवस्था में आ जाता है और यह अवस्था मानव...
16/09/2020

मानव जीवन में वृद्धावस्था एक ऐसी घड़ी आती है जब मानव का शरीर जीर्ण-क्षीण एवं जर्जर अवस्था में आ जाता है और यह अवस्था मानव शरीर के अंत का प्रमाण होती है। इस अवस्था के पश्चात यह सुनिश्चित हो जाता है मनुष्य का अंत निकट है।
इसी भांति अन्य वस्तुएं भी अंत तक सफर तय कर एक दिन सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाती हैं।
परंतु इस संसार में कुछ ऐसी वस्तुएं भी विद्यमान हैं जिनका अस्तित्व सदैव अमर होता है और वे सदा जीवन्त रहती हैं। जैसे- स्मृतियाँ, महापुरुषों के अमर नाम और उनके कार्य आदि आदि। इसी भांति विद्यालय भी सदा जीवन्त रहते है और इन्हें सदा जीवित रखते हैं- विद्यार्थी।
विद्यार्थी कभी विद्यालय को वृद्ध नहीं होने देते बल्कि समय के साथ परिवर्तित कर विद्यालय को और भी नवीन बना देते हैं। जहाँ संसार की अन्य वस्तुएं वृद्धावस्था की ओर प्रस्थान करती हैं वहीं विद्यालय युवावस्था की ओर बढ़ता है और प्रतिदिन सुदृढ़ होता है।
विद्यार्थी एक निश्चित समय विद्यालय में व्यतीत कर विद्यार्थियों की एक नयी युवा पीढ़ी विद्यालय को सौंप देते हैं। वर्षों से चले आ रहे विद्यालय आज भी उसी उत्साह और उसी उमंग के साथ विद्यमान हैं और निश्चित ही भविष्य में भी इसी प्रकार विद्यार्थियों के नवजीवन को संवारेंगे।
इसीलिए तो मानव जीवन की भांति विद्यालय कभी वृद्ध होते नहीं दिखते क्योंकि, विद्यालय की आत्मा विद्यार्थियों में निवास करती है और विद्यार्थियों के भीतर जो उमंग एवं उत्साह होता है वह शायद ही अन्य किसी के भीतर होता है।

न जाने कहाँ खो गयी विद्यालय की वह रौनक जब विद्यालय विद्यार्थियों के स्वरों से गूंजता रहता था। न जाने कहाँ चले गए वे क्षण...
15/09/2020

न जाने कहाँ खो गयी विद्यालय की वह रौनक जब विद्यालय विद्यार्थियों के स्वरों से गूंजता रहता था। न जाने कहाँ चले गए वे क्षण जब विद्यालय विद्यार्थियों से भरा रहता था और आज विद्यालय इस प्रकार सूना हो गया है मानो सारे विद्यार्थी कहीं खो गए हों या मानो विद्यालय की आत्मा (विद्यार्थी) विद्यालय से कहीं परे चली गयी हो और विद्यालय बिना आत्मा के मृत शरीर के समान हो गया हो। या मानो पतझड़ के समय के उस वृक्ष की भांति हो गया हो जिसका अस्तित्व तो जीवित है परंतु मात्र लकड़ी तक। इस समय न तो वृक्ष पर कोई हरी पत्ती ही है और न ही वृक्ष पर किसी प्रकार की कोई हरियाली मात्र ही शेष बची है।
बिना विद्यार्थियों के विद्यालय का कोई अस्तित्व ही नहीं। वर्तमान में विद्यालय ऐसे प्रतीत होते हैं मानो किसी पुराने से खंडहर में आ गए हों जहाँ वर्षों से कोई मनुष्य न रहता हो।
न जाने कब ये भयावह समय विद्यालय से प्रस्थान करेगा और वही पुराना समय पुनः लौट आएगा जब विद्यालय के आंगन के चारों ओर विद्यार्थी रूपी हरियाली पुनः स्थापित होगी और विद्यालय पुनः हरे-भरे वृक्ष की भांति लहरा उठेगा।
न जाने कब वे क्षण लौट आएंगे जब विद्यालय की आत्मा पुनः विद्यालय में प्रवेश करेगी और विद्यालय पुनः जीवित हो उठेगा। आशा है ये समय पतझड़ के समय की भांति व्यतीत हो जाए और जल्द ही वसंत विद्यालय की ओर प्रस्थान करे।
प्रकृति संपूर्ण मानव जाति को इस चुनोतिपूर्ण समय से लड़ने की क्षमता प्रदान करे।

प्रिय अध्यापक आप सभी को धन्यवादआप न होते तो शायद इस अज्ञानता के अन्धकार से कभी बाहर न निकल पाते।यदि आपके उज्वल ज्ञान की ...
11/09/2020

प्रिय अध्यापक आप सभी को धन्यवाद
आप न होते तो शायद इस अज्ञानता के अन्धकार से कभी बाहर न निकल पाते।
यदि आपके उज्वल ज्ञान की दृष्टि हम पर न बरसती तो शायद हम जहाँ थे वहीँ रहते। न जान पाते कभी जीवन को जीने का सही तरीका।
आप न होते तो न जान पाते कभी की शिष्टाचार नाम की भी कोई वस्तु होती है जो शिक्षित मानव जीवन का अभिन्न अंग है।
यदि आप न होते न जान पाते शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण है प्रत्येक मनुष्य के लिए। न जान पाते एक शिक्षित मानव क्या कुछ नहीं कर सकता।
धन्यवाद आपने हमें एक भिन्न दृष्टिकोण प्रदान किया दुनिया को देखने का, वस्तुओं को देखने का, मनुष्यों को देखने का।
बालपन से युवास्था के शिखर तक प्रत्येक पग पर अध्यापकों ने सोपान की भांति हमें सफलता के शिखर पर पहुंचने में सहायता की है। प्राथमिक कक्षाओं से हमारी डगमगाती हुई कलम को सुदृढ़ किया आपने और आज यह सुदृढ़ कलम हमारा एक ऐसा हथियार बन गया है जिसके सम्मुख समस्त संसार नतमस्तक हो जाता है। आपके द्वारा प्रदत्त हथियार विश्व में सर्वशक्तिमान है। इसी हथियार के बिना शायद संविधान को लिखित स्वरूप न मिल पाता, जिस पर संपूर्ण देश का शासन-प्रशासन आधारित है।
निश्चय ही हम अध्यापकों वह भेंट तो प्रदान नहीं कर सकते जिसके वे हक़दार हैं परंतु अपनी तरफ से धन्यवाद अदा अवश्य कर सकते हैं।
एक बार पुनः "मेरे प्रिय अध्यापक आप सभी को सादर धन्यवाद"

अध्यापक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं"शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे,बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह...
05/09/2020

अध्यापक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
"शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे,बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें।"
"भगवान् की पूजा नहीं होती बल्कि उन लोगों की पूजा होती है जो उनके नाम पर बोलने का दावा करते हैं।"
'सर्वपल्ली राधाकृष्णन'

भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति एवं द्वितीय राष्ट्रपति "डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन" का जन्म 5 सितंबर 1888 में तमिलनाडु, भारत में हुआ था। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, शिक्षाविद एवं प्रख्यात दार्शनिक थे।
डॉ राधाकृष्णन संपूर्ण विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए। वह जिस विषय को भी पढ़ाते थे, पहले स्वयं उसका अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे कठिन विषय को भी वह अपनी शैली से सरल और रोचक बना देते थे। इसलिये इनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप मे मनाते हैं। प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 1954 में उन्हें उनकी दार्शनिक व शैक्षिक उपलब्धियों के लिये देश का सर्वोच्च अलंकरण "भारत रत्न" से सम्मानित किया।
प्रत्येक शिक्षक स्वयं में विशिष्ट होता है और सबका स्वयं का एक विशिष्ट तरीका होता है अपने ज्ञान को प्रदर्शित करने का।
प्रत्येक विद्यार्थी का अपने अनुसार पृथक एक प्रिय अध्यापक होता है परंतु, सारे ही अध्यापक एकसामान होते हैं और प्रत्येक अध्यापक की।मंशा विद्यार्थियों को आने अमूल्य ज्ञान से सिंचित कर उन्हें आगे बढ़ाने की ही होती है।
अतः सभी अध्यापकों को हृदय से अध्यापक दिवस की हार्दिक बधाई। आशा है हम विद्यार्थी सदा ही आपके इस अमूल्य ज्ञान से सिंचित होते रहें और आपका साथ सदैव हमारे साथ बना रहे।

क्षण, अनगिनत क्षणमनुष्य जीवन के हर क्षण कुछ न कुछ करता ही रहता है और कुछ क्षण तो स्मृतियों में तब्दील हो जाते हैं, जो हम...
02/09/2020

क्षण, अनगिनत क्षण
मनुष्य जीवन के हर क्षण कुछ न कुछ करता ही रहता है और कुछ क्षण तो स्मृतियों में तब्दील हो जाते हैं, जो हमेशा हृदय के एक कोने में जीवित रहते हैं एवं लगता है वर्तमान में भी हम उन क्षणों को फिर जी रहे हैं।
कुछ क्षण विद्यालय के प्रांगण के जिसमें कहीं पर हरी बुग्याल तो कहीं पर सुखी मिट्टी और उस प्रांगण में प्रातः काल पंक्तियों में विद्यार्थियों के प्रार्थना, समूह गान, राष्ट्रगान आदि के गूंजते हुए स्वर आसपास के वातावरण को संगीतमय बना देते। मध्यान्तर में उसी प्रांगण में विद्यार्थियों की हंसी-ठिठोली, भाग-दौड़, खेल-कूद आदि सबके अपने-अपने भिन्न-भिन्न खेल और विद्यार्थियों के क़दमों के स्वर से गूंजता हुआ प्रांगण, भिन्न प्रकार की रौनक चारों और विद्यार्थियों के शोर से गूंजता हुआ आसमान राहगीरों को भी उनके विद्यार्थी जीवन का समरण करा देते।
कुछ क्षण अपने सहपाठियों के संग। सबके अपने-अपने समूह और सभी अपने समूह में व्यस्त एवं प्रसन्न। सभी समूहों की भिन्न-भिन्न बातें, भिन्न-भिन्न वार्तालाप के विषय और छोटी कक्षा के विद्यार्थियों की बातें ही निराली होती थीं अध्यापकों को भी मग्न कर देतीं।
कुछ क्षण मध्यान्तर में टिफिन के जब सारे सहपाठी एक-दूसरे के टिफिनों पर झपट पड़ते और अपना बचा के रखते फिर दिखा-दिखा के खाते। सचमुच अनोखे ही क्षण थे वे, खाना पेट में कम एवं इधर-उधर ज्यादा गिर जाता और पेट तो हंसी से ही भर जाता। ऐसा लगता मानो जीवन की सारी भूख ही मिट गयी हो। आज भी जब स्मृतियाँ जाग उठती हैं तो सारी भूख ही मिट जाती है।
कुछ क्षण प्रातः काल विद्यालय जाते समय के जब विद्यार्थी शोर मचाते हुए अपने कदम विद्यालय की ओर बढ़ाते हुए, राहगीर भी एक क्षण को परेशान हो जाते परंतु कभी-कबार उन्हें भी अपने क्षण स्मरण हो जाते एवं कभी तो वे भी विद्यार्थियों के संग हो जाते। रस्ते भर में खूब मस्ती होती और छुट्टी के उपरान्त विद्यालय से घर जाते समय तो अलग ही नज़ारा होता। मस्ती के मारे तो कपड़े ही गंदे हो जाते और फिर घरवालों की डांट अलग। परंतु उस मस्ती के समक्ष माता-पिता की डांट भी हल्की पड़ जाती और फिर स्वयं से अपने कपडे भी धोते और सोचते कल से इतनी मस्ती नहीं करेंगे लेकिन, माने कौन? अगले दिन फिर वही नज़ारा, फिर वही मस्ती और उस मस्ती के समक्ष माता-पिता की डांट भी विस्मृत हो जाती।
सचमुच इतने अनोखे क्षण शायद ही कोई और होंगे।

31/08/2020

आ गए यहाँ जवां कदम, मंजिलों को ढूंढते हुए।
गीत के बोल जो निरर्थक ही नहीं बोले जाते। सबसे अधिक उत्साह होता है जवां क़दमों में। जवां कदम वह कर गुजरते हैं जो शायद कोई स्वप्न में भी न सोचता होगा। ये कदम यदि एकजुट हो जाएं तो क्या कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि ईनमें सबसे अधिक क्षमता होती है। वास्तविकता में इनके पास ही सबसे अधिक जिम्मेदारियां होती हैं और ये क़दम बड़े उत्साह के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के मार्ग पर बढ़ते जाते हैं।
यही जवां कदम समाज को, देश को बुराइयों, कुरीतियों, कुप्रथाओं से मुक्त करने की क्षमता भी रखते हैं।
इन्हीं क़दमों को समर्पित चंद वाक्य हमारी ओर से विद्यार्थियों के एकस्वर में।

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