04/10/2025
*एक जाग्रत देवस्थान :- कुंडेश्वर*
बुंदेलखंड के अति प्राचीनतम देव स्थानों की बात करें तो कुंडेश्वर का महादेव मंदिर उन गिने चुने देवस्थानों में से एक है जिसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथो में प्राप्त होता है. सनातन धर्म के मूलाधार शिवलिंग की आराधना, उपासना और भक्ति यहां शताब्दियों से की जा रही है. कुंडेश्वर का महादेव मंदिर न केवल धार्मिक आस्था, विश्वास, श्रद्धा, भक्ति और अध्यात्म का केंद्र है बल्कि यहां लोक संस्कृति की विविधता के दर्शन भी होते हैं.
यह देवस्थान (कुंडेश्वर), टीकमगढ़ जिला मुख्यालय से 7 किलोमीटर दूर ललितपुर रोड पर स्थित है. नदी कुंड के निकट स्थापित होने के कारण इस देवस्थान को कुंडेश्वर कहते हैं.
एक प्रचलित प्राचीन लोककथानुसार जिस स्थान पर अभी शिवलिंग स्थापित है उस स्थान पर प्राचीन काल में एक स्त्री ओखली में धान कूट रही थी. मूसल से धान कूटते-कूटते उसकी ओखली से अचानक रक्त धारा प्रवाहित होने लगी. यह देख स्त्री घबरा गई उसने ओखली को कूंड़े से ढक दिया और बस्ती के लोगो को इकट्ठा किया. उन लोगों ने देखा ओखली से शिवलिंग आकार का एक पत्थर बाहर निकल आया है जिसके सर पर कूंड़ा रखा हुआ है. लोगों को यह चमत्कार लगा, उन्होंने इस स्थान को कूंड़ादेव संबोधित किया और किसी अदृश्य शक्ति से प्रेरित होकर यहां शिवालय का निर्माण कराया. इसीलिए कुंडेश्वर को कूंड़ादेव भी कहते है.
एक अन्य प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार अतिप्राचीन काल में बानपुर (जिला ललितपुर, उ.प्र.) का राजा बाणासुर इस भूभाग पर राज किया करता था. बाणासुर की पुत्री राजकुमारी उषा महादेव की अनन्य भक्त थी. राजकुमारी उषा बानपुर से नित्य प्रतिदिन कुंडेश्वर आकर मंदिर के निकट से बहने वाली जमड़ार नदी पर बने कुंड में स्नान कर शिवलिंग पर जल चढ़ाया करती थी. तभी से इस कुंड का नाम उषा कुंड पड़ गया.
कुंडेश्वर महादेव मंदिर का स्वयंभू शिवलिंग अलौकिक और आश्चर्य से परिपूर्ण है. इस शिवलिंग पर सर्पाकार उभरी आकृतियां आश्चर्य जनक है. लोक विश्वास है कि इस दिव्य शिवलिंग का आकार प्रतिवर्ष एक चावल के दाने बराबर बढ़ रहा है. टीकमगढ़, कुमेडी कॉलोनी मे रहने वाली 70 वर्षीय श्रीमती बीना श्रीवास्तव जी कहती हैं "जब हम बचपन में कुंडेश्वर जाते थे तब शिवलिंग का आकार छोटा था किंतु अब यह अप्रत्याशित रूप से काफी बड़ा हो गया है. आश्चर्यजनक है"
शताब्दियों से इस स्वयंभू शिवलिंग पर जल चढ़ाया जा रहा है किंतु आश्चर्य है और शोध का विषय भी की इसका तिल मात्र भी क्षरण नहीं हुआ हैं. टीकमगढ़ के महाराजा वीर सिंह जूदेव (द्वितीय) ने 1930 के दशक में इस शिवलिंग के चारों ओर नीचे तक खुदाई करवाई थी किंतु शिवलिंग का अंत प्राप्त नहीं हो सका था अंत में खुदाई बंद करवा कर इसके ऊपर विशाल छतरी का निर्माण करवाया था.
इतिहासकार श्री राम गोपाल रैकवार जी कहते हैं "मंदिर प्रांगण में स्थापित नंदी की मूर्ति संभवत मदन वर्मा (चंदेल कालीन) के समय की है. यह आहार के मदनेश्वर मंदिर के भग्नावेशों से प्राप्त कर यहां पर स्थापित की गई थी. इस नंदी की मूर्ति पर संवत 1202 अंकित है."
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भूगर्भीय हलचल या संपीडन से शिवलिंग का आकार लगातार बढ़ सकता है. कुछ भी हो लोक मान्यता और विश्वास के आगे विज्ञान भी नतमस्तक है. सुदूर क्षेत्र से प्रतिदिन सैकड़ो की संख्या में स्त्री, पुरुष और बच्चे कुंडेश्वर के महादेव मंदिर में आते हैं और अपने आराध्य को पूजते हैं. यहां लोगों की प्रार्थनाएं, इच्छाएं और कामनाएं पूर्ण होती है. लोग सहज भाव से दान पुण्य भी करते हैं. यह देवस्थान पूरे बुंदेलखंड में तीर्थ स्थल के रूप में प्रसिद्ध है.
कुंडेश्वर शिवालय के नजदीक से बहती जमड़ार नदी का सौंदर्य शिशिर ऋतु में चरम पर होता है. नदी में प्रवाहित स्वच्छ व निर्मल जल, स्नान को प्रेरित करता है. जमड़ार नदी और इससे सटे लगे मधुवन का सौंदर्य और सम्मोहन ही था कि प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी और यशपाल जैन जी यहां वर्षों तक साहित्य साधना करते रहे.
कुंडेश्वर में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान स्थापित है. यहां जिले का एकमात्र नवोदय विद्यालय संचालित है. शिवालय के पास ही प्रसिद्ध पापट संग्रहालय भी स्थापित है.
प्रतिवर्ष मकर संक्रांति और शिवरात्रि पर्व पर कुंडेश्वर मे विशाल मेले का आयोजन किया जाता है. कुंडेश्वर शिवालय के चारों ओर मनमोहक विशाल प्रांगण का निर्माण कराया गया है. यहां कुंडेश्वर के महादेव मंदिर का वातावरण धर्म, अध्यात्म और आनंद की अनुभूति से परिपूर्ण है.
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