Prakash Nayak

Prakash Nayak मातृभूमि की सेवा में निज, जीवन अर्पित करना है।
मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ..

Jeevan Pushp Chadha Charnon me magen matrubhumi se yah var
Tera vaibhav Amar Rahe Maa Ham Din Char Rahe Na Rahe.......

*गाय व भैंस के दूध में अंतर* जो बहुत कम लोग जानते हैं !भैंस अपने बच्चे से पीठ फेर कर बैठती है चाहे उसके बच्चे को कुत्ते ...
12/08/2026

*गाय व भैंस के दूध में अंतर*
जो बहुत कम लोग जानते हैं !

भैंस अपने बच्चे से पीठ फेर कर बैठती है चाहे उसके बच्चे को कुत्ते खा जायें वह नहीं बचायेगीl

जबकि गाय के बच्चे के पास अनजान आदमी तो क्या शेर भी आ जाये तो जान दे देगी, परन्तु जीते जी बच्चे पर आँच नही आने देगी।
इसीलिए उसके दूध में स्नेह का गुण भरपूर होता है।

भैंस को गन्दगी पसन्द है, कीचड़ में लथपथ रहेगी,,

पर गाय अपने गोबर पर भी नहीं बैठेगी उसे स्वच्छता प्रिय है।

भैंस को घर से 2 किमी दूर तालाब में छोड़कर आ जाओ वह घर नहीं आ सकती उसकी याददास्त जीरो है।

गाय को घर से 5 किमी दूर छोड़ दो।
वह घर का रास्ता जानती है,आ जायेगी।
गाय के दूध में स्मृति तेज है।

दस भैंसों को बाँधकर 20 फुट दूर से उनके बच्चों को छोड़ दो, एक भी बच्चा अपनी माँ को नहीं पहचान सकता,

जबकि गौशालाओं में दिन भर गाय व बछड़े अलग-अलग शैड में रखते हैं, सायंकाल जब सबका माता से मिलन होता है तो सभी बच्चे (हजारों की स॔ख्या में) अपनी अपनी माँ को पहचान कर दूध पीते हैं, ये है गाय दूध की याददास्त।

जब भैंस का दूध निकालते हैं तो भैंस सारा दूध दे देती है,

परन्तु गाय थोड़ा-सा दूध ऊपर चढ़ा लेती है, और जब उसके बच्चे को छोड़ेंगे तो उस चढ़ाये दूध को उतार देती है।
ये गुण माँ के हैं जो भैंस मे नहीं हैं।

गली में बच्चे खेल रहे हों और भैंस भागती आ जाये तो बच्चों पर पैर अवश्य रखेगी...

लेकिन गाय आ जाये तो कभी भी बच्चों पर पैर नही रखेगी।

भैंस धूप और गर्मी सहन नहीं कर सकती...

जबकि गाय मई जून में भी धूप में बैठ सकती है।

भैंस का दूध तामसिक होता है....
जबकि गाय का सात्विक।

भैंस का दूध आलस्य भरा होता है, उसका बच्चा दिन भर ऐसे पड़ा रहेगा जैसेे भाँग खाकर पड़ा हो।
जब दूध निकालने का समय होगा तो मालिक उसे उठायेगा...

परन्तु गाय का बछड़ा इतना उछलेगा कि आप रस्सा खोल नहीं पायेंगे।

फिर भी लोग भैंस खरीदने में लाखों रुपए खर्च करते हैं....
जबकि गौमाता का दूध अमृत समान होता है।।

*🙏जय गौमाता🙏*

07/08/2026

भारत माता की वैभव गाथा
कैसे थी ये अपनी सोने की चिड़िया

विदेशी यात्रियों की जुबानी

तेवेर्निर बंजारा समुदाय का वर्णन 350 साल पूर्व वर्णन किया है ।
350 साल पूर्व उसने यातायात के लिए बंजारों का वर्णन किया है जो चार तरह के होते थे जो सिर्फ एक ही वस्तु का ट्रांसपोर्ट एक स्थान से दूसरे स्थान पर करते थे, और जीवन भर सिर्फ यही व्यवसाय करते थे। इन चार वस्तुओं में ज्वार बाजरा मक्का , चावल, दलहन, और नमक को देश के अंदर और बाहर भेजने के लिए करते थे ।

एक कारवां में 10,000 से 12,000 तक बैलगाड़ियां होते थे। उनके नायकों को राजकुमार कहा जाता था जो गले में मोतियों की माला पहनते थे ।

इन बैलगाड़ियों का कारवाँ गुजरता था तो तेवेर्निर जैसे यात्रियों को कभी कभी रास्ता में पास पाने हेतु 2-2 या 3-3 दिन का इंतजार करना होता था।

कभी कभी इन कारवां के नायकों में , किसका कारवां पहले गुजरेगा , इस बात को लेकर खूनी जंग भी हो जाती थी । ऐसी स्थिति में इन नायकों को मोघल बादशाह व्यापर के सुचारु रूप से चलाने हेतु अपने पास मिलने हेतु बुलाता था और दोनों को समझाकर और भविष्य में झगड़ा न करने का आश्वासन लेकर उनको एक एक लाख रूपये और मोतियों की माला देकर विदा करता था

व्यक्तिगत रूप से बैलगाड़ी के लिए उसको 600 रुपये उस समय देने पड़े 60 दिन की यात्रा के लिए।

अनुवादक ने बताया कि इनको अब भी देखा जा सकता है लेकिन रेलवे ने इनको इस कार्य से कार्यमुक्त कर बेरोजगार कर चुका है।
Ref: Travels in India : Tevernier; P. 40-41 Volume-l

एक और पुस्तक से बानगी देखिए

1442 AD मे मध्यकालीन भारत का वैभव और समाज का वर्णन एक अरेबिक यात्री ABD-ER-RAZZZAK की यात्रा वृत्तांत से

मध्यकालीन भारत का वैभव और समाज का वर्णन एक अरेबिक यात्री ABD-ER-RAZZZAK की यात्रा वृत्तांत से
अब इसी पुस्तक से एक अन्य यात्री ABD-ER-RAZZZAK की यात्रा वृत्तांत के बारे में ।

( पेज 107 ऑफ़ 254)
साल 845 ( 1442 AD) , इस यात्रा वृत्तांत का लेखक Abd-er- razzak , Ishak का पुत्र सार्वभौमिक नरेश के आदेश के पालन हेतु Omurz प्रान्त से समुद्र तट की ओर चल देता है ।

अंततः 18 दिनों की यात्रा के उपरांत , वहां के राजा और शासक की मदद से हमारी नौका कालीकट में जा खड़ी हुई ।अब इस विनम्र दास इस देश के वैभव और परम्पर और संस्कृति की चर्चा सुनें।

कालीकट एक सुरक्षित बंदरगाह है जहा Omurz की तरह हर देश और शहर से व्यापारी अपना सामान ले आते हैं ।यहाँ पर मूल्यवान वस्तुओं का भंडार है जो कि Abyssinia Zirbad (दक्कन) Zanguebar से आते हैं। समय समय पर अल्लाह के घर (मक्का) से जहाज आते रहते हैं ।इस कस्बे में काफ़िर (infidels) रहते हैं।जोकि इस hostile समुद्री तट के किनारे बसे हुए हैं।

यहाँ पर्याप्त मात्रा में मुसलमान भी रहते हैं जिन्होंने यहाँ दो मस्जिद बना रखी है और जिसमे हर शुक्रवार को वो नमाज पढ़ने जाते हैं । यहाँ एक क़ाजी है जो Schfei समुदाय का है।
इस कसबे में सुरक्षा और न्याय इस तरह से स्थापित है कि अन्य देशो से सबसे धनी व्यापारी जब समुद्री मार्ग से अपना सामान ले आते है तो जहाज से सामान उतरवाकर सीधे बिना किसी हिचकिचाहट के सामन सीधे बाजार में भेज देते है ; यहाँ तक कि उसका हिसाब किताब रखने की या उस पर निगाह रखने की आवाश्याकता भी महसूस नहीं करते। कस्टम हाउस के अधिकारी स्वयं इन समानो की देख रेख का इंतजाम करते हैं जो इन पर 24 घण्टे निगाह रखते हैं।जब सामन बिक जाता है तो सामान की कीमत 1/40 वां One fortieth हिस्सा ड्यूटी के रूप में देना पड़ता है।जो सामान नहीं बिकता उस पर कोई टैक्स नहीं लगता।
(याद रखें कि उस समयकाल में कालीकट में हिन्दू राजाओ का राज्य था।अब दूसरे बंदरगाहों का क्या हाल था ?)

दूसरे बंदरगाहों में अजीब सी रिवायत है।जैसे ही कोई जहाज दुर्योग से हवा की रुख के कारन वहां पहुचता है , वहां के निवासी उसको लूट लेते हैं।लेकिन कालीकट में ऐसा नहीं है , हर जहाज चाहे वो जहाँ से भी आई हो और कही भी उतरती हो , जब भी बंदरगाह पर लगती है तो उससे एक सा ही व्योहार किया जाता है , और किसी को कोई समस्या नहीं होती।

पेज -121 ऑफ़ 254
इस देश के काले लोग सर्वथा नंगे रहते हैं, मात्र शरीर के मध्यभाग में एक कपड़ा लपेटे रहते हैं जिसको लंगोटा (Lankautah) कहते हैं जो नाभि से घुटने तक लटकता है।उनके एक हाँथ में भारतीय तलवार (Poignard) होती है जो एक पानी की बूँद की तरह चमकदार होती है; और दूसरे हाँथ में एक ढाल (Buckler of oxide) होती है ।ये परंपरा राजा से लेकर रंक तक सब के लिए एक सामान है। This custom is common to the king and beggar.
जहाँ तक मुसलमानों की बात है वे अरबों की तरह शानदार (Apparel ) और हर बात में बैभव (Luxury) का प्रदर्शन करते हैं।

पेज 121
कुछ समय अवधि के बाद जब मेरे पास पर्याप्त काफिरों और मुसलमानों को देखने का अनुभव हो गया , और पर्याप्त सुविधा से मेरे आवास की व्यवस्था हो गयी और तीन दिनों के उपरांत राजा से मिलने का अवसर प्राप्त हुवा तो मैंने बाकी ऊपर वर्णित हिंदुओं की वेश - भूसा वाले नंगे बदन के जिस व्यक्ति को देखा उसे समरी '(Sameri) के राजा ' के नाम से जाना जाता था।जब इसकी मृत्यु होगी तो इसके बहन के लड़कों को इसका उत्तराधिकार मिलेगा ; न कि इसके बेटों या भाइयों को या अन्य किसी रिष्तेदार को उत्तराधिकार मिलेगा। ताकत के दम पर ( जोर जबरदस्ती ) कोई सिंहासनारूढ़ नहीं हो सकता।

यहाँ काफ़िर काफी गुटों में बंटे हुए है जैसे Bramins (ब्राम्हण) Djogis (जोगी) व अन्य। यद्यपि सारे लोग बहुदेवबाद और मूर्तिपूजा के मूलभूत सिद्धांतों से सहमत हैं लेकिन सब समुदायों के अपने विशेष रीति रिवाज हैं।
(Forbes की हिंदुस्तानी डिक्शनरी के अनुसार Djoghis हिन्दू Ascetics ( संत) हैं : ये हिन्दूओं की एक जाति है जो मुख्यतः बुनकर हैं )
नोट -- इस तर्क पर कबीर को समझें। उनका समयकाल भी लगभग इसी के आस पास का है ।

जब मैं राजकुमार से मिलने गया तो पूरा हाल दो या तीन हजार हिन्दुओ से भरा हुवा था , जिनकी वेश भूषा ठीक वैसे ही थी जिसका पूर्व में जिक्र किया जा चूका है ; मुस्लमाओं के भी प्रमुख लोग वहां थे।

अब्देररज्जाक को जब विजयनगर के राजा का आमन्त्रण मिलता है तो , वो बतलाता है कि यद्यपि सामरी (कालीकट का राजा ) जिसके राज्य में कालीकट जैसे 300 बंदरगाह थे और जिसके राज्य का पूरा चक्कर लगाने में 3 महीना गुजर जाय विजयनगर के राजा के अधीन नहीं था लेकिन वो उनका बहुत सम्मान करता था और उनके डर ( सम्मान होना चाहिए क्योंकि एक अरब सिर्फ ताकत की जुबां ही जानता है ) से खड़ा हो जाता है।

कालीकट से जहाज लगातार मक्का जाते रहते हैं जिसमे मुख्यतः काली मिर्च भरा होता था।
कालीकट के निवासी बहुत साहसी सामुद्रिक नाविक हैं जिनको Techini - betechegan (चीनी के पुत्र ) के नाम से जाना जाता है और समुद्री लुटेरों की हिम्मत इनके जहाजों पर आक्रमण करने की नहीं पडती है।

इस बंदरगाह पर हर इच्छित चीज उपलब्ध है । सिर्फ एक ही चीज की मनाही है और वह है गोबध और उसका मांस भक्षण : यदि ऐसे किसी व्यक्ति का पता चल जाय कि किसी ने गाय का वध किया है या उसका मांस खाया है तो उसको तुरंत मृत्यदंड दी जाती है। यहाँ पर गायों का इतना सम्मान है कि लोग गाय के सूखे गोबर का तिलक लगातेहैं ।
पेज -123
इसके बाद जब रज्जाक बेलूर (Belour) पहुँचता है तो उसका भी वर्णन करता है --" यहाँ के घर पैलेस की तरह विशाल हैं और यहाँ की औरतों ने मुझे हूरों की खूबसूरती की याद दिला दी । अगर मैं इन भवनों के बारे में वर्णन करूँगा तो लोग मुझ पर अतिशयोक्ति का आरोप लगाएंगे। लेकिन एक सामान्य खाका खींचना उचित होगा । कस्बे के मध्य में एक 10 घेज़ (Ghez) का खुला मैदान है जिसकी तुलना जन्नत के बाग़ से की जा सकती है।
पेज - 126
इस कसबे में दो तीन दिन बिताकर अप्रैल के अंत में हम विजयनगर शहर पहुँचते है।राजा अपने अनुचरों को हम लोगों से मिलने के लिए भेजता है और हमारे निवास की खूबसूरत व्यवस्था करता है।

अब्दुर्रज़्ज़ाक ने विजयनगर का भी वर्णन किया है।उसने एक विशाल जनसंख्या वाली जगह देखी जिसका राजा महान और विशाल राज्य का स्वामी था जो सेरेंडिब से kalbergah तक फैला हुवा था। बंगाल के सीमान्त से मालाबार तक एक हजार Parasang ( ये दुरी की पर्शियन इकाई है जसका अर्थ 3.5 मील या 5.6 किलोमीटर होता है ) से ज्यादा विशाल साम्राज्य है
इसकी जमीन उपजाऊ है और ये उत्तम कृषि वाला देश है , जिसके अंतर्गत लगभग 300 बंदरगाह हैं। यहाँ 1000 से ज्यादा विशालकाय हांथी हैं जो दैत्य जैसे भयानक और पहाड़ जैसे विशालकाय हैं।यहाँ की सेना में 11 लाख सैनिक हैं । पेज - 127

पूरे हिंदुस्तान में राय (राजाओं) का एकाधिकार है । इस देश के राजा क़ी टाइटल भी राय है ।इसके बाद दूसरा नंबर ब्राम्हणो का है जो सामाजिक रूप से बाकियो से श्रेष्ठ माने जाते हैं ।
kalilah और dimna (कालिदास और वेद ??) की पुस्तकें , विद्वता के साहित्य की उत्क्रिस्ट कृतिया हैं जो पर्शियन भाषा में भी उपलब्ध है।

विजयनगर एक ऐसा शहर है जिसकी बराबरी विश्व में कोई भी नहीं कर सकता है और ऐसा शहर न लोगों ने न अपनी आँखों से देखा होगा न कानों से सुना होगा। पेज - 127
इस साम्राज्य में इतनी विशाल जनसंख्या निवास करती है कि इसकी विस्तृत व्याख्या किये बगैर इसके बारे में बताना असंभव है। राजा के महल में अनेक कोठरियां हैं जो धन दौलत से भरी पड़ी हैं।

इस देश के सभी निवासी ( All inhabitants of this country) , चाहे वो ऊचें राजपद पर हों या नीचे राजपद पर हों , या फिर बाजार के अर्टिसन ( down to the artisan of the Bazar) , सबके सब अपने कानों में मोती या अन्य महगें पथरो से मढ़ी हुई बालियां , हार अगुंठिया बाजूबंद अपने कानों गले उँगलियों और भुजाओं में धारण करते हैं।
All the inhabitants of the country , both those of exalted rank and of the inferior class down to the artizans of Bazaar , wear pearls , or rings adorned with precious stones , in their ear , on their arms , on upper part of the hand and on the fingers. पेज -- 130।
India in the fifteenth century .
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being a collection of
"Narratives of Voyages of India"
By - R. H. Major Esq., F.S.A. से उद्धृत
✍🏻

300 वर्ष पहले समृद्धि का पैमाना गाय हुआ करती थी।
एक जोड़ी बैल, छह तोला सोने में आती थी, आप कल्पना कर सकते हैं।

बैल, घोड़ा, ऊंट के मूल्य में बहुत कम अंतर था।
तब सुथार एक गिन्नी में बैलगाड़ी बनाते थे। सबकुछ शिल्प आधारित था।

कुम्हार, चर्मकार, नापित, घसियारा, पानी लाने वाला, पशु चराने वाला, पशुओं के उपकरण, बधियाकरण, प्रशिक्षण, जैसे अनेक कार्य थे।

उदाहरण के लिए एक कुम्हार को लगभग 100 घरों के लिए वर्ष पर्यंत बर्तन सप्लाई के बदले वर्ष में दो बार एक-एक चांदी का सिक्का मिलता था। यानि 200 तोला चाँदी प्रतिवर्ष, साथ ही अन्न फ्री, सुरक्षा फ्री, मिट्टी पानी अपनी मर्जी से और अपने धंधे का स्वामी।

सोना, चांदी, घी और अन्न से विनिमय होता था। सौ सेर तिल्ली के तेल के बदले 50 सेर घी।
फल फूल तो लगभग मुफ्त थे, सूखे मेवे, मसाले, नारियल और पंसारी का सामान हाट में बिकता था।
विगत 200 वर्षों से थोड़ा पीछे जाकर भारतीय अर्थतन्त्र का विचार करेंगे तो आपको बहुत आश्चर्यजनक भारत के दर्शन होंगे।

कहीं कहीं अब भी उसके अवशेष विद्यमान हैं, धर्मपाल साहित्य का अध्ययन कर वस्तुस्थिति जान सकते हैं। मेरी जानकारी का स्रोत भी धर्मपाल जी का साहित्य ही है, यह दस खण्डों में प्रकाशित है, आप पढ़ सकते हैं।
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गड़बड़ हुई अंग्रेजों के हस्तक्षेप से, उदाहरण के लिए नील की जबरन खेती से अन्न का कृत्रिम अभाव या ढाका की मलमल बनाने वाले कारीगरों के हाथ काट देने अथवा विदर्भ के इस्पात कारखानों को बंद करने के एवज में घर बैठे धन देना, जैसी क्रूर कुटिल बातों से यह सारा अर्थतन्त्र जो अन्योन्याश्रित और सुदृढ़ था, नष्ट हो गया। भुखमरी, विद्वेष, रोजगार का संकट और जातीय विभेद भी बढ़ा, और भारतीय समाज अत्यंत दीन हीन स्थिति को पहुँच गया।

प्रेमचंद के भारत में जिस अभागे भारत का वर्णन है, वह मरणासन्न भारतीय अर्थव्यवस्था का शोकगीत है। बिल्कुल लुटा पिटा, भूखा नंगा, हालांकि नेहरू परिवार तब भी सोने के बटन से सज्जित अचकन पहन कर अधिवेशन से एक दिन पहले होने वाले जुलूस में बग्घी पर सवार होकर ही शामिल होता था!!

भूखा नँगा भारत, हमें मिला 1947 में, तबतक सबकुछ तबाह हो गया था केवल ऊपरी वर्ग में हुंडी और सेहनाणी परम्परा विद्यमान थी, शिल्प आधारित समस्त औद्योगिक व्यवस्था छिन्न भिन्न हो चुकी थी, जिसमें वामपंथी तिकड़म की फसल की अपार सम्भावना थी और यही छल हम आज तक भुगत रहे हैं।
आधुनिक तकनीक के सहारे #हिन्दू_अर्थतन्त्र की पुनर्स्थापना हमारा लक्ष्य होना चाहिए।
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अभी त्यौहार शुरू हैं।
पूरे वर्ष का एक तिहाई व्यय इन उत्सवों में होने वाला है। शोरूम और कॉरपोरेट को छोड़कर, जहाँ तक सम्भव हो अपनी जड़ों को खोजिए।

एक परिवार पर आश्रित सात शिल्प हुआ करते थे, ढूंढिए कि आज वे किस स्थिति में है?

और धनतेरस तक, किसी को कोई रियायत नहीं। इन लफंगों को तो बाद में भी नहीं।
विचार कीजिए! हमारा स्वयं का इकोसिस्टम विकसित करने में योगदान दीजिये।
✍🏻

06/08/2026
कोलाचेल युद्ध में डचों को हराने वाले राजा मार्तण्ड वर्मा : इतिहास की पुस्तकों से गायबडच वर्तमान नीदरलैंड (यूरोप) के निवा...
05/08/2026

कोलाचेल युद्ध में डचों को हराने वाले राजा मार्तण्ड वर्मा : इतिहास की पुस्तकों से गायब

डच वर्तमान नीदरलैंड (यूरोप) के निवासी हैं. भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से इन लोगों ने 1605 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी बनायीं और ये लोग केरल के मालाबार तट पर आ गए. ये लोग मसाले, काली मिर्च, शक्कर आदि का व्यापार करते थे.
धीरे धीरे इन लोगों ने श्रीलंका, केरल, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा और सूरत में अपना व्यवसाय फैला लिया. इनकी साम्राज्यवादी लालसा के कारण इन लोगों ने अनेक स्थानों पर किले बना लिए और सेना बनायीं. श्रीलंका और ट्रावनकोर इनका मुख्य गढ़ था. स्थानीय कमजोर राजाओं को हरा कर डच लोगों ने कोचीन और क्विलोन (quilon) पर कब्ज़ा कर लिया.
उन दिनों केरल छोटी छोटी रियासतों में बंटा हुआ था. मार्तण्ड वर्मा एक छोटी सी रियासत वेनाद का राजा था. दूरदर्शी मार्तण्ड वर्मा ने सोचा कि यदि मालाबार (केरल) को विदेशी शक्ति से बचाना है तो सबसे पहले केरल का एकीकरण करना होगा. उसने अत्तिंगल, क्विलोन (quilon) और कायामकुलम रियासतों को जीत कर अपने राज्य की सीमा बढाई.
अब उसकी नज़र ट्रावनकोर पर थी जिसके मित्र डच थे. श्रीलंका में स्थित डच गवर्नर इम्होफ्फ़ (Gustaaf Willem van Imhoff) ने मार्तण्ड वर्मा को पत्र लिख कर कायामकुलम पर राज करने पर अप्रसन्नता दर्शायी. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने जबाब दिया कि 'राजाओं के काम में दखल देना तुम्हारा काम नहीं, तुम लोग सिर्फ व्यापारी हो और व्यापार करने तक ही सीमित रहो'.
कुछ समय बाद मार्तण्ड वर्मा ने ट्रावनकोर पर भी कब्ज़ा कर लिया. इस पर डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने कहा कि मार्तण्ड वर्मा ट्रावनकोर खाली कर दे वर्ना डचों से युद्ध करना पड़ेगा. मार्तण्ड वर्मा ने उत्तर दिया कि 'अगर डच सेना मेरे राज्य में आई तो उसे पराजित किया जाएगा और मै यूरोप पर भी आक्रमण का विचार कर रहा हूँ'. ['I would overcome any Dutch forces that were sent to my kingdom, going on to say that I am considering an invasion of Europe'- Koshy, M. O. (1989). The Dutch Power in Kerala, 1729-1758) ]
डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने पराजित ट्रावनकोर राजा की पुत्री स्वरूपम को ट्रावनकोर का शासक घोषित कर दिया. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने मालाबार में स्थित डचों के सारे किलों पर कब्ज़ा कर लिया.
अब डच गवर्नर इम्होफ्फ़ की आज्ञा से मार्तण्ड वर्मा पर आक्रमण करने श्रीलंका में स्थित और बंगाल, कोरमंडल, बर्मा से बुलाई गयी 50000 की विशाल डच जलसेना लेकर कमांडर दी-लेननोय कोलंबो से ट्रावनकोर की राजधानी पद्मनाभपुर के लिए चला. मार्तण्ड वर्मा ने अपनी वीर नायर जलसेना का नेतृत्व स्वयं किया और डच सेना को कन्याकुमारी के पास कोलाचेल के समुद्र में घेर लिया.
कई दिनों के भीषण समुद्री संग्राम के बाद 31 जुलाई 1741 को मार्तण्ड वर्मा की जीत हुई. इस युद्ध में लगभग 11000 डच सैनिक बंदी बनाये गए, शेष डच सैनिक युद्ध में हताहत हो गए.
डच कमांडर दी-लेननोय, उप कमांडर डोनादी तथा 24 डच जलसेना टुकड़ियों के कप्तानो को हिन्दुस्तानी सेना ने बंदी बना लिया और राजा मार्तण्ड वर्मा के सामने पेश किया. राजा ने जरा भी नरमी न दिखाते हुए उनको आजीवन कन्याकुमारी के पास उदयगिरी किले में कैदी बना कर रखा.
अपनी जान बचाने के लिए इनका गवर्नर इम्होफ्फ़ श्रीलंका से भाग गया. पकडे गए 11000 डच सैनिकों को नीदरलैंड जाने और कभी हिंदुस्तान न आने की शर्त पर वापस भेजा गया, जिसे नायर जलसेना की निगरानी में अदन तक भेजा गया, वहां से डच सैनिक यूरोप चले गए.
कुछ वर्षों बाद कमांडर दी-लेननोय और उप कमांडर डोनादी को राजा ने इस शर्त पर क्षमा किया कि वे आजीवन राजा के नौकर बने रहेंगे तथा उदयगिरी के किले में राजा के सैनिकों को प्रशिक्षण देंगे. इस तरह नायर सेना यूरोपियन युद्ध कला में निपुण हुई. उदयगिरी के किले में कमांडर दी-लेननोय की मृत्यु हुई, वहां आज भी उसकी कब्र है.
केरल और तमिलनाडु के बचे खुचे डचों को पकड़ कर राजा मार्तण्ड सिंह ने 1753 में उनको एक और संधि करने पर विवश किया जिसे मवेलिक्कारा की संधि कहा जाता है. इस संधि के अनुसार डचों को इंडोनेशिया से शक्कर लाने और काली मिर्च का व्यवसाय करने की इजाजत दी जायेगी और बदले में डच लोग राजा को यूरोप से उन्नत किस्म के हथियार और गोला बारूद ला कर देंगे.
राजा ने कोलाचेल में विजय स्तम्भ लगवाया और बाद में भारत सरकार ने वहां शिला पट्ट लगवाया.
मार्तण्ड वर्मा की इस विजय से डचों का भारी नुकसान हुआ और डच सैन्य शक्ति पूरी तरह से समाप्त हो गयी. श्रीलंका, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा एवं सूरत में डचो की ताकत क्षीण हो गयी.
राजा मार्तण्ड वर्मा ने छत्रपति शिवाजी से प्रेरणा लेकर अपनी सशक्त जल सेना बनायीं थी.
तिरुवनन्तपुरम का प्रसिद्द पद्मनाभस्वामी मंदिर राजा मार्तण्ड वर्मा ने बनवाया और अपनी सारी संपत्ति मंदिर को दान कर के स्वयं भगवान विष्णु के दास बन गए. इस मंदिर के 5 तहखाने खोले गए जिनमे बेशुमार संपत्ति मिली. छठा तहखाना खोले जाने पर अभी रोक लगी हुई है.
यह दुख की बात है कि महान राजा मार्तण्ड वर्मा और कोलाचेल के युद्ध को NCERT की इतिहास की पुस्तकों में कोई जगह न मिल सकी.
1757 में अपनी मृत्यु से पूर्व दूरदर्शी राजा मार्तण्ड वर्मा ने अपने पुत्र राजकुमार राम वर्मा को लिखा था - 'जो मैंने डचों के साथ किया वही बंगाल के नवाब को अंग्रेजों के साथ करना चाहिए. उनको बंगाल की खाड़ी में युद्ध कर के पराजित करें, वर्ना एक दिन बंगाल और फिर पूरे हिंदुस्तान पर अंग्रेजो का कब्ज़ा हो जाएगा'.

छत्रपति संभाजी महाराज ने शस्त्र युक्त नौ जहाज का निर्माण किया यह कहना गलत नही होगा संभाजी महाराज नौ वैज्ञानिक तो थे ही साथ में शस्त्र विशेषज्ञ भी थे उन्हें ज्ञात था कौनसा नौके में कितने वजन का तोप ले जा सकता हैं ।
छत्रपति शिवाजी महाराज नौसेना के जनक थे केवल भारत ही नही अपितु पुरे विश्व को नौ सेना बनाने का विचार सूत्र दिया नौका को केवल वाहन रूप में इस्तेमाल किया जाता था शिवाजी महाराज प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने साधारण नौका को समंदर का रक्षक का रूप दे दिया शस्त्रयुक्त लड़ाकू जहाज बनाकर । शिवपुत्र संभाजी महाराज समंदर के अपराजय योद्धा थे समंदर की रास्ता उन्हें अपनी हथेलियों की लकीर जैसी मालूम थी , इसलिए पुर्तगालियों के पसीने छूटते थे संभाजी महाराज के नाम से केवल।

पुर्तगाली साथ युद्ध-:
‘छत्रपति संभाजी महाराजने गोवामें पुर्तगालियों से किया युद्ध राजनीतिक के साथ ही धार्मिक भी था । हिंदुओं का धर्मांतरण करना तथा धर्मांतरित न होनेवालों को जीवित जलाने की शृंखला चलानेवाले पुर्तगाली पादरियों के ऊपरी वस्त्र उतार कर तथा दोनों हाथ पीछे बांधकर संभाजी महाराज ने गांव में उनका जुलूस निकाला ।’ – प्रा. श.श्री. पुराणिक (ग्रंथ : ‘मराठ्यांचे स्वातंत्र्यसमर (अर्थात् मराठोंका स्वतंत्रतासंग्राम’ डपूर्वार्ध़) छत्रपति संभाजी महाराज अत्यंत क्रोधित हुए क्योंकि गोवा में पुर्तगाली हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन के साथ साथ मंदिरों को ध्वंश भी कर रहे थे। छत्रपति संभाजी महाराज द्वारा किये जा रहे हमले से अत्यंत भयभीत होगे थे जो पोर्तुगाली के लिखे चिट्ठी में दर्शाता हैं : “ संभाजी आजके सबसे पराक्रमी व्यक्ति हैं और हमें इस बात का अनुभव हैं” ।
यह रहा पोर्तुगाली इसाई कसाइयों द्वारा लिखा हुआ शब्द-: (The Portuguese were very frightened of being assaulted by Sambhaji Maharaj, and this reflects in their letter to the British in which they wrote, ‘Now-a-days Sambhaji is the most powerful person and we have experienced it’. )

संभाजी महाराज गोवा की आज़ादी एवं हिन्दुओ के उप्पर हो रहे अत्याचारों का बदला लेने के लिए 7000 मावले इक्कट्ठा किया और पुर्तगालीयों पर आक्रमण कर दिया पुर्तगाली सेना जनरल अल्बर्टो फ्रांसिस के पैरो की ज़मीन खिसक गई महाराज संभाजी ने 50,000 पुर्तगालीयों सेना को मौत के घाट उतार दिया बचे हुए पुर्तगाली अपने सामान उठाकर चर्च में जाकर प्रार्थना करने लगे और कोई चमत्कार होने का इंतेज़ार कर रहे थे संभाजी महाराज के डर से समस्त पुर्तगाली लूटेरे पंजिम बंदरगाह से 500 जहाजों पर संभाजी महाराज के तलवारों से बच कर कायर 25000 से अधिक पुर्तगाली लूटेरे वापस पुर्तगाल भागे ।

संभाजी महाराज ने पुरे गोवा का शुद्धिकरण करवाया एवं ईसाइयत धर्म में परिवर्तित हुए हिंदुओं को हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया ।

पुर्तगाली सेना के एक सैनिक मोंटिरो अफोंसो वापस पुर्तगाल जाकर किताब लिखा (Dr**as da India) लिखता हैं संभाजी महाराज को हराना किसी पहाड़ को तोड़ने से ज्यादा मुश्किल था महाराज संभाजी के आक्रमण करने की पद्धति के बारे में से ब्रिटिश साम्राज्य तक भयभीत होगया गया था अंग्रेजो और हम (पुर्तगाल) समझ गए थे भारत को गुलाम बनाने का सपना अधुरा रह जायेगा।
संभाजी महाराज की युद्धनिति थी अगर दुश्मनों की संख्या ज्यादा हो या उनके घर में घुसकर युद्ध करना हो तो घात लगा कर वार करना चाहिए जिसे आज भी विश्व के हर सेना इस्तेमाल करती हैं जिसे कहते हैं Ambush War Technic। पुर्तगाल के सैनिक कप्तान अफोंसो कहता हैं संभाजी महाराज के इस युद्ध निति की कहर पुर्तगाल तक फैल गई थी संभाजी महाराज की आक्रमण करने का वक़्त होता था रात के ८ से ९ बजे के बीच और जब यह जान बचाकर पुर्तगाल भागे तब वहा भी कोई भी पुर्तगाली लूटेरा इस ८ से ९ बजे के बीच घर से नहीं निकलता था in लूटेरो को महाराज संभाजी ने तलवार की वह स्वाद चखाई थी जिससे यह अपने देश में भी डर से बहार नहीं निकलते थे घर के ।

हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया गया :
हम सभी जानते हैं छत्रपति शिवाजी महाराज के निकट साथी, सेनापति नेताजी पालकर जब औरंगजेब के हाथ लगे और उसने उनका जबरन धर्म परिवर्तन कर उसका नाम मोहम्मद कुलि खान रख दिया । शिवाजी महाराज ने मुसलमान बने नेताजी पालकर को ब्राम्हणों की सहायता से पुनः हिन्दू बनाया और उनको हिन्दू धर्म में शामिल कर उनको प्रतिष्ठित किया।
हालांकि, यह ध्यान देने की बात हैं संभाजी महाराज ने हिंदुओं के लिए अपने प्रांत में एक अलग विभाग स्थापित किया था जिसका नाम रखा गया 'पुनः परिवर्तन समारोह' दुसरे धर्म में परिवर्तित होगये हिन्दुओ के लिए इस समारोह का आयोजन किया गया था ।
हर्षुल नामक गाँव में कुलकर्णी ब्राह्मण रहता था संभाजी महाराज पर लिखे इतिहास में इस वाकया का उल्लेख हैं कुलकर्णी नामक ब्राह्मण को ज़बरन इस्लाम में परिवर्तित किया था मुगल सरदारों ने कुलकर्णी मुगल सरदारों की कैद से रिहा होते ही संभाजी महाराज के पास आकर उन्होंने अपनी पुन: हिन्दू धर्म अपनाने की इच्छा जताई संभाजी महाराज ने तुरंत 'पुनः धर्म परिवर्तन समारोह का योजन करवाया और हिन्दू धर्म पुनःपरिवर्तित किया ।
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कैसे छत्रपति संभाजी ने भारत में पुर्तगाली शक्ति को नष्ट कर दिया

पुर्तगाली
अंग्रेजों के भारत में कदम रखने से पहले ही, एक अन्य यूरोपीय साम्राज्य ने भारत के तटों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली थी—न केवल व्यापार के माध्यम से, बल्कि विजय, जबरन धर्म परिवर्तन और क्रूर धार्मिक जांच के माध्यम से भी। गोवा में मजबूती से जमे पुर्तगालियों ने मंदिरों को नष्ट कर दिया था, हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया था और इतिहास की सबसे क्रूर जांचों में से एक, कुख्यात गोवा जांच शुरू की थी। लेकिन इससे पहले उन्होंने जो कुछ भी सामना नहीं किया था, उसके विपरीत, पश्चिमी घाट से एक मराठा राजा उभरा जिसने उन्हें न केवल भूमि पर बल्कि समुद्र में भी चुनौती दी। उनका नाम छत्रपति संभाजी महाराज था।

पुर्तगाली भारत कैसे पहुंचे?

15वीं शताब्दी में, पोप निकोलस पंचम द्वारा जारी पोप के आदेशों ने पुर्तगाल को गैर-ईसाई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करने और उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का दैवीय अधिकार प्रदान किया। वास्को दा गामा ने भारत में मसालों के व्यापार की तलाश में मुस्लिम-नियंत्रित क्षेत्रों को दरकिनार करते हुए लिस्बन से यात्रा शुरू की। वह 1498 में कालीकट पहुंचे, और एक दशक से कुछ अधिक समय बाद, बीजापुर सल्तनत के मुस्लिम शासन से त्रस्त स्थानीय हिंदुओं के समर्थन से अफोंसो डी अल्बुकर्क ने 1510 में गोवा पर कब्जा कर लिया। प्रारंभ में, पुर्तगालियों ने धार्मिक स्वतंत्रता का वादा किया, लेकिन 1540 के दशक तक, यह भ्रम टूट गया। जेसुइट मिशनरियों ने "कठोर धार्मिकता" की नीति लागू की। मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया, ब्राह्मणों को निष्कासित कर दिया गया, त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और ईसाई धर्म को एकमात्र वैध धर्म बना दिया गया। संत के रूप में विख्यात जेसुइट मिशनरी फ्रांसिस जेवियर ने गोवा में पवित्र धर्म जांच के लिए पैरवी की। उनकी मृत्यु के कुछ वर्षों के भीतर, 1560 में, एक धार्मिक न्यायाधिकरण की स्थापना की गई, जिसने यातनाओं का तांडव मचा दिया: सार्वजनिक रूप से जलाना, जल यातना, यातना देना और असंतुष्टों को नग्न अवस्था में सड़कों पर घुमाना। पवित्र हिंदू ग्रंथों को राख में बदल दिया गया।

मराठा-पुर्तगाली संबंध:
1667 तक, गोवा और सालसेट क्षेत्रों को जबरन धर्मांतरित कर शत प्रतिशत कैथोलिक घोषित कर दिया गया था। लेकिन प्रतिरोध पनप रहा था। स्वराज के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुर्तगालियों के क्षेत्रों पर आक्रमण किया था। 1680 तक, उनकी सेना गोवा में प्रवेश करने ही वाली थी कि छत्रपति की मृत्यु की खबर उनके सैनिकों तक पहुँची। कहा जाता है कि पुर्तगाली वायसराय ने खुशी मनाते हुए घोषणा की:

“ राज्य अब चिंता मुक्त है। वह शांति काल में युद्ध काल की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक था। ”

लेकिन वह उत्सव समय से पहले था। उनके पुत्र, छत्रपति संभाजी, इस विरासत को आगे बढ़ाएंगे और इससे भी कहीं अधिक प्रगति करेंगे।

छत्रपति संभाजी महाराज ने प्रारंभ में पुर्तगालियों के साथ शांति स्थापित करने का प्रयास किया, क्योंकि वे सिंहासन के उत्तराधिकार के संघर्ष से जूझ रहे थे। दोनों पक्षों के बीच शांति वार्ता चल रही थी और दोनों पक्षों के संबंध सौहार्दपूर्ण प्रतीत हो रहे थे।

औरंगजेब के बेटे, राजकुमार अकबर ने छत्रपति संभाजी के साथ शरण ली
राजपूताना में घटित घटनाओं ने दक्कन का भाग्य बदल दिया। निर्णायक मोड़ तब आया जब मुगल राजकुमार अकबर ने अपने पिता औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह करते हुए छत्रपति संभाजी की शरण ली। इससे मराठा औरंगजेब के प्रमुख निशाने पर आ गए। 1681 में, औरंगजेब और पुर्तगालियों ने स्वराज को कुचलने के लिए गठबंधन किया। बहादुर खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने पुर्तगालियों की सहायता से कल्याण, जो एक महत्वपूर्ण तटीय केंद्र था, को घेर लिया।

पुर्तगालियों ने मुगल साम्राज्य—संभाजी महाराज के कट्टर शत्रु—को जहाज, रसद और खुफिया जानकारी की आपूर्ति शुरू कर दी। इसके बदले में, पुर्तगाली वायसराय ने उनकी सहायता के लिए पूरे कोंकण क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की मांग की। इस विश्वासघात ने गहरा घाव दिया। यह अब राजनीति नहीं, बल्कि व्यक्तिगत मामला बन गया था।

लेकिन छत्रपति संभाजी ने त्वरित और रणनीतिक गुरिल्ला युद्ध का प्रयोग करते हुए मुगल आपूर्ति लाइनों को तबाह कर दिया और 1683 तक उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। पुर्तगालियों के इस विश्वासघात के प्रतिशोध में, उन्होंने युद्ध की घोषणा कर दी।

औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध मराठा आक्रमण
जुलाई 1683 की एक तूफानी रात में मराठों ने अपना आक्रमण शुरू किया। संभाजी की सेना ने चेउल और कोरलाई के किलों पर हमला किया और साथ ही मुगल-समर्थक सिद्दी शासकों के नौसैनिक अड्डे जंजीरा पर भी आक्रमण किया। उन्होंने वसई पर धावा बोला और पुर्तगालियों के अनाज भंडारों को नष्ट कर दिया। इसके तुरंत बाद पारसिक किला भी उनके कब्जे में आ गया। पेशवा नीलकंठ मोरेश्वर के नेतृत्व में अतिरिक्त सेना ने चेउल पर बमबारी की, जबकि पुर्तगालियों द्वारा गोवा में अपने वायसराय से की गई अपीलें लगभग अनसुनी रह गईं, क्योंकि उन्हें गोवा पर मराठों के बड़े आक्रमण का डर था। वायसराय ने अपने नौसैनिक संसाधनों को गोवा की रक्षा पर केंद्रित कर दिया।

इस भीषण अभियान को देखकर अंग्रेजों ने भी बॉम्बे को संभाजी को 40,000 पैगोडा के बदले बेचने के लिए गुप्त बातचीत शुरू कर दी। संघर्ष तब और बढ़ गया जब पुर्तगालियों ने अपने उत्तरी क्षेत्र पर दबाव कम करने के लिए पोंडा किले की घेराबंदी करके दक्षिण कोंकण में एक नया मोर्चा खोलकर जवाबी हमला किया।

अनुभवी सेनापति येसाजी कंक के नेतृत्व में, मराठा सेना संख्या में कम होने के बावजूद डटी रही। छत्रपति संभाजी स्वयं 8,000 घुड़सवारों और 1,500 पैदल सैनिकों के साथ पहुंचे। 9 नवंबर, 1683 को, जब किले में अंतिम आक्रमण होने ही वाला था, उन्होंने 600 अतिरिक्त सैनिकों के साथ उत्तम घुड़सवार संरचना में किले पर आक्रमण किया। उनके आगमन से रक्षकों में जोश भर गया। मराठों ने जोरदार जवाबी हमला किया, जिससे पुर्तगालियों को पीछे हटना पड़ा और घेराबंदी पूरी तरह से छोड़नी पड़ी।

अब छत्रपति संभाजी के पक्ष में पूर्ण बल था। उसी महीने के अंत में, 40 मराठा सैनिक भेस बदलकर सैंटो एस्टेवाओ में घुस गए, पुर्तगाली सेनापति की हत्या कर दी और मुख्य सेना को हमला करने का संकेत दिया। पुर्तगाली वायसराय फ्रांसिस्को डी तावोरा घबरा गए और सैनिकों के साथ एक पहाड़ी पर स्थित गिरजाघर की ओर दौड़े, लेकिन मराठों के घात में फंस गए। यूरोपीय व्यापारी और आम नागरिक आसपास की पहाड़ियों से दिनदहाड़े इस पूरे युद्ध को देख रहे थे। शक्तिशाली यूरोपीय नौसेना की पराजय पूर्ण हो गई। पुर्तगाली सैनिक पीछे हटते हुए डूब गए, उनके शव उस शहर (गोवा) के पास से बहते हुए गुजरे जिस पर उन्होंने कभी शासन किया था। पहाड़ी पर स्थित गिरजाघर को भी स्वराज की आक्रमणकारी सेनाओं ने जलाकर राख कर दिया।

दिसंबर 1683 तक, संभाजी ने अपना अब तक का सबसे बड़ा अभियान चलाया। 6,000 घुड़सवारों और 10,000 पैदल सैनिकों के साथ, मराठों ने बारदेज़ और सालसेट के अत्यधिक किलेबंद क्षेत्रों पर धावा बोल दिया। एक के बाद एक किले आत्मसमर्पण करते चले गए। पानी की कमी से कमजोर हो चुका तिविम कुछ ही दिनों में गिर गया। पुर्तगाली सैनिकों से हथियार और कपड़े छीन लिए गए और उन्हें शर्मिंदा करके वापस भेज दिया गया। चर्चों को सैन्य अड्डों में बदल दिया गया और जेसुइट पादरी यूरोपीय सैनिकों और धर्मान्तरित मूल निवासियों के साथ मिलकर पुर्तगाली सेना का नेतृत्व कर रहे थे ताकि अपने क्षेत्रों की रक्षा कर सकें। इसी बीच, पुर्तगालियों के उत्तरी क्षेत्रों में, करंजा और एलिफेंटा द्वीप गिर गए, और आसपास के क्षेत्रों को स्वराज की सेनाओं ने तहस-नहस कर दिया।

फिर आया अंतिम अपमान। धर्म जांच के दौरान हिंदुओं को जिस प्रकार सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया था, उसके प्रतिशोध में छत्रपति संभाजी ने 140 धर्म प्रचारकों को उसी प्रकार नग्न अवस्था में जुलूस में शामिल करने का आदेश दिया, जैसे कभी हिंदुओं के साथ किया गया था। यह प्रतिशोध तो था ही, साथ ही एक संदेश भी।

पुर्तगाली वायसराय, पूर्ण पतन के भय से, बॉम जीसस के गिरजाघर में चले गए और संत जेवियर की समाधि पर प्रार्थना की। उन्हें पता था कि संभाजी गोवा पर अंतिम घेराबंदी की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन भाग्य को ही अपना भाग्य तय करना था। जैसे ही मराठा राजा ने अपने अंतिम आक्रमण की तैयारी की, शाह आलम के नेतृत्व में 100,000 सैनिकों की विशाल मुगल सेना कोंकण पर टूट पड़ी। संभाजी के सामने एक विकल्प था: गोवा को नष्ट करके दो महाशक्तियों के बीच कुचल जाने का जोखिम उठाना, या पीछे हटकर स्वराज की रक्षा करना। उन्होंने बुद्धिमानी भरा विकल्प चुना।

गोवा पर आक्रमण रोक दिया गया—लेकिन इसका परिणाम ऐतिहासिक रहा। हालाँकि संभाजी गोवा पर कब्ज़ा नहीं कर पाए, फिर भी उन्होंने पुर्तगालियों की अजेयता के भ्रम को चकनाचूर कर दिया। उनके किले खंडहर बन गए, उनका गौरव चूर-चूर हो गया, और मुगलों के मूक सहयोगी के रूप में उनकी भूमिका पूरी तरह उजागर हो गई। जिस साम्राज्य ने कभी भारतीय धरती पर अत्याचार किए थे, उसने अब अपने औपनिवेशिक इतिहास में अभूतपूर्व पराजय का स्वाद चखा।

छत्रपति संभाजी ने न केवल पुर्तगालियों से युद्ध किया, बल्कि उन्होंने उनके अहंकार को पत्थर-पत्थर करके, किले-किले करके ध्वस्त कर दिया।

05/08/2026

मुंबई के पास एक स्थान है वसई जहाँ समुद्र किनारे पुर्तगालियो द्वारा बनवाया एक किला है,
इस किले पर पहुँचने के लिए आपको एक बस स्टॉप पर उतरना होता है जिसका नाम है चिमाजी अप्पा जंक्शन।

किसी भी स्थान के नाम के पीछे उस जगह का इतिहास छिपा होता है, यह बात थोड़ी जिज्ञासा पैदा करती है कि आखिर पुर्तगालियो के किले का चिमाजी अप्पा से क्या लेना देना होगा।

चिमाजी अप्पा एक ब्राह्मण, पेशवा बाजीराव के छोटे भाई और मराठा सेना के जनरल थे।
उत्सुकता में इस किले का इतिहास निकालना पड़ा और जो सच सामने आया उसने झकझोर कर रख दिया और सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर चिमाजी अप्पा जैसे महापुरुष इतिहास में कहाँ गुमनाम हो गए।

नेहरूजी पर दोषारोपण कर भी दिया जाए तो हिंदूवादियों ने भी इन्हें प्रसिद्धि दिलाने का क्या प्रयास किया??

भारत को गुलाम बनाने का सपना सबसे पहले पुर्तगालियो ने ही देखा था ये मुगलो से पहले भारत मे आ गए थे।
सन 1738 तक इन्होंने मुंबई और गोवा पर कब्जा कर लिया साथ ही एक अलग राष्ट्र की घोषणा कर दी।
उस समय मराठा साम्राज्य बेहद शक्तिशाली हो चुका था। ठीक एक साल पहले पेशवा बाजीराव दिल्ली और भोपाल में सारे रणबांकुरों को धूल चटाकर लौटे थे।

बाजीराव ने पुर्तगालियो को संदेश भेजा कि आप मुंबई और गोवा में व्यापार करें मगर ये दोनो मराठा साम्राज्य और भारत के अंग हैं इसलिए मुगलो की तरह आप भी हमारी अधीनता स्वीकार करें।
जब पुर्तगाली नही माने तो बाजीराव ने अपने छोटे भाई और मराठा जनरल श्री चिमाजी अप्पा को युद्ध का आदेश दिया।
चिमाजी अप्पा ने पहले गोवा पर हमला किया और वहाँ के चर्चो को तहस नहस कर दिया इससे पुर्तगालियो की आर्थिक कमर टूट गयी।
फिर वसई आये जहाँ ये किला है।

चिमाजी अप्पा ने 2 घंटे लगातार किले पर बमबारी की और पुर्तगालियो ने सफेद झंडा दिखाया, चिमाजी अप्पा ने किले पर मराठा ध्वज फहराया और पुर्तगालियो ने समझौता किया कि वे सिर्फ व्यापार करेंगे और अपने लाभ का एक चौथाई हिस्सा मराठा साम्राज्य को कर के रुप में देंगे।

चिमाजी अप्पा ने सारे हथियार, गोला, बारूद जब्त कर लिए।
इस युद्ध ने पुर्तगालियो की शक्ति का अंत कर दिया और भारत पर राज करने का सपना आखिर सपना ही बनकर रह गया।

हिन्दू धर्म मे यह बेहद दुर्लभ है कि किसी व्यक्ति को शस्त्र के साथ शास्त्र का भी ज्ञान हो, चिमाजी अप्पा उन्ही लोगो मे से एक थे।
वसई का किला खण्डहर हो चुका है कुछ सालो में शायद खत्म भी हो जाये मगर उस बस स्टॉप का नाम हमेशा भारत के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराता रहेगा कि एक भरतवंशी योद्धा इस जगह आया था जिसने मातृभूमि को पराधीनता में जकड़े जाने से पहले ही आज़ाद कर लिया और इतिहास में अमर हो गया।

नीचे किले में बनी चिमाजी अप्पा की मूर्ति है।
चिमाजी अप्पा अपनी विजयी मुद्रा में खड़े आज अपने अस्तित्व का युद्ध भी लड़ रहे है क्योकि राष्ट्रवादी व्यस्त है अपनी राजनीति में।।
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Civil Lines
Tikamgarh
472001

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