05/08/2026
कोलाचेल युद्ध में डचों को हराने वाले राजा मार्तण्ड वर्मा : इतिहास की पुस्तकों से गायब
डच वर्तमान नीदरलैंड (यूरोप) के निवासी हैं. भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से इन लोगों ने 1605 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी बनायीं और ये लोग केरल के मालाबार तट पर आ गए. ये लोग मसाले, काली मिर्च, शक्कर आदि का व्यापार करते थे.
धीरे धीरे इन लोगों ने श्रीलंका, केरल, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा और सूरत में अपना व्यवसाय फैला लिया. इनकी साम्राज्यवादी लालसा के कारण इन लोगों ने अनेक स्थानों पर किले बना लिए और सेना बनायीं. श्रीलंका और ट्रावनकोर इनका मुख्य गढ़ था. स्थानीय कमजोर राजाओं को हरा कर डच लोगों ने कोचीन और क्विलोन (quilon) पर कब्ज़ा कर लिया.
उन दिनों केरल छोटी छोटी रियासतों में बंटा हुआ था. मार्तण्ड वर्मा एक छोटी सी रियासत वेनाद का राजा था. दूरदर्शी मार्तण्ड वर्मा ने सोचा कि यदि मालाबार (केरल) को विदेशी शक्ति से बचाना है तो सबसे पहले केरल का एकीकरण करना होगा. उसने अत्तिंगल, क्विलोन (quilon) और कायामकुलम रियासतों को जीत कर अपने राज्य की सीमा बढाई.
अब उसकी नज़र ट्रावनकोर पर थी जिसके मित्र डच थे. श्रीलंका में स्थित डच गवर्नर इम्होफ्फ़ (Gustaaf Willem van Imhoff) ने मार्तण्ड वर्मा को पत्र लिख कर कायामकुलम पर राज करने पर अप्रसन्नता दर्शायी. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने जबाब दिया कि 'राजाओं के काम में दखल देना तुम्हारा काम नहीं, तुम लोग सिर्फ व्यापारी हो और व्यापार करने तक ही सीमित रहो'.
कुछ समय बाद मार्तण्ड वर्मा ने ट्रावनकोर पर भी कब्ज़ा कर लिया. इस पर डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने कहा कि मार्तण्ड वर्मा ट्रावनकोर खाली कर दे वर्ना डचों से युद्ध करना पड़ेगा. मार्तण्ड वर्मा ने उत्तर दिया कि 'अगर डच सेना मेरे राज्य में आई तो उसे पराजित किया जाएगा और मै यूरोप पर भी आक्रमण का विचार कर रहा हूँ'. ['I would overcome any Dutch forces that were sent to my kingdom, going on to say that I am considering an invasion of Europe'- Koshy, M. O. (1989). The Dutch Power in Kerala, 1729-1758) ]
डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने पराजित ट्रावनकोर राजा की पुत्री स्वरूपम को ट्रावनकोर का शासक घोषित कर दिया. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने मालाबार में स्थित डचों के सारे किलों पर कब्ज़ा कर लिया.
अब डच गवर्नर इम्होफ्फ़ की आज्ञा से मार्तण्ड वर्मा पर आक्रमण करने श्रीलंका में स्थित और बंगाल, कोरमंडल, बर्मा से बुलाई गयी 50000 की विशाल डच जलसेना लेकर कमांडर दी-लेननोय कोलंबो से ट्रावनकोर की राजधानी पद्मनाभपुर के लिए चला. मार्तण्ड वर्मा ने अपनी वीर नायर जलसेना का नेतृत्व स्वयं किया और डच सेना को कन्याकुमारी के पास कोलाचेल के समुद्र में घेर लिया.
कई दिनों के भीषण समुद्री संग्राम के बाद 31 जुलाई 1741 को मार्तण्ड वर्मा की जीत हुई. इस युद्ध में लगभग 11000 डच सैनिक बंदी बनाये गए, शेष डच सैनिक युद्ध में हताहत हो गए.
डच कमांडर दी-लेननोय, उप कमांडर डोनादी तथा 24 डच जलसेना टुकड़ियों के कप्तानो को हिन्दुस्तानी सेना ने बंदी बना लिया और राजा मार्तण्ड वर्मा के सामने पेश किया. राजा ने जरा भी नरमी न दिखाते हुए उनको आजीवन कन्याकुमारी के पास उदयगिरी किले में कैदी बना कर रखा.
अपनी जान बचाने के लिए इनका गवर्नर इम्होफ्फ़ श्रीलंका से भाग गया. पकडे गए 11000 डच सैनिकों को नीदरलैंड जाने और कभी हिंदुस्तान न आने की शर्त पर वापस भेजा गया, जिसे नायर जलसेना की निगरानी में अदन तक भेजा गया, वहां से डच सैनिक यूरोप चले गए.
कुछ वर्षों बाद कमांडर दी-लेननोय और उप कमांडर डोनादी को राजा ने इस शर्त पर क्षमा किया कि वे आजीवन राजा के नौकर बने रहेंगे तथा उदयगिरी के किले में राजा के सैनिकों को प्रशिक्षण देंगे. इस तरह नायर सेना यूरोपियन युद्ध कला में निपुण हुई. उदयगिरी के किले में कमांडर दी-लेननोय की मृत्यु हुई, वहां आज भी उसकी कब्र है.
केरल और तमिलनाडु के बचे खुचे डचों को पकड़ कर राजा मार्तण्ड सिंह ने 1753 में उनको एक और संधि करने पर विवश किया जिसे मवेलिक्कारा की संधि कहा जाता है. इस संधि के अनुसार डचों को इंडोनेशिया से शक्कर लाने और काली मिर्च का व्यवसाय करने की इजाजत दी जायेगी और बदले में डच लोग राजा को यूरोप से उन्नत किस्म के हथियार और गोला बारूद ला कर देंगे.
राजा ने कोलाचेल में विजय स्तम्भ लगवाया और बाद में भारत सरकार ने वहां शिला पट्ट लगवाया.
मार्तण्ड वर्मा की इस विजय से डचों का भारी नुकसान हुआ और डच सैन्य शक्ति पूरी तरह से समाप्त हो गयी. श्रीलंका, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा एवं सूरत में डचो की ताकत क्षीण हो गयी.
राजा मार्तण्ड वर्मा ने छत्रपति शिवाजी से प्रेरणा लेकर अपनी सशक्त जल सेना बनायीं थी.
तिरुवनन्तपुरम का प्रसिद्द पद्मनाभस्वामी मंदिर राजा मार्तण्ड वर्मा ने बनवाया और अपनी सारी संपत्ति मंदिर को दान कर के स्वयं भगवान विष्णु के दास बन गए. इस मंदिर के 5 तहखाने खोले गए जिनमे बेशुमार संपत्ति मिली. छठा तहखाना खोले जाने पर अभी रोक लगी हुई है.
यह दुख की बात है कि महान राजा मार्तण्ड वर्मा और कोलाचेल के युद्ध को NCERT की इतिहास की पुस्तकों में कोई जगह न मिल सकी.
1757 में अपनी मृत्यु से पूर्व दूरदर्शी राजा मार्तण्ड वर्मा ने अपने पुत्र राजकुमार राम वर्मा को लिखा था - 'जो मैंने डचों के साथ किया वही बंगाल के नवाब को अंग्रेजों के साथ करना चाहिए. उनको बंगाल की खाड़ी में युद्ध कर के पराजित करें, वर्ना एक दिन बंगाल और फिर पूरे हिंदुस्तान पर अंग्रेजो का कब्ज़ा हो जाएगा'.
छत्रपति संभाजी महाराज ने शस्त्र युक्त नौ जहाज का निर्माण किया यह कहना गलत नही होगा संभाजी महाराज नौ वैज्ञानिक तो थे ही साथ में शस्त्र विशेषज्ञ भी थे उन्हें ज्ञात था कौनसा नौके में कितने वजन का तोप ले जा सकता हैं ।
छत्रपति शिवाजी महाराज नौसेना के जनक थे केवल भारत ही नही अपितु पुरे विश्व को नौ सेना बनाने का विचार सूत्र दिया नौका को केवल वाहन रूप में इस्तेमाल किया जाता था शिवाजी महाराज प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने साधारण नौका को समंदर का रक्षक का रूप दे दिया शस्त्रयुक्त लड़ाकू जहाज बनाकर । शिवपुत्र संभाजी महाराज समंदर के अपराजय योद्धा थे समंदर की रास्ता उन्हें अपनी हथेलियों की लकीर जैसी मालूम थी , इसलिए पुर्तगालियों के पसीने छूटते थे संभाजी महाराज के नाम से केवल।
पुर्तगाली साथ युद्ध-:
‘छत्रपति संभाजी महाराजने गोवामें पुर्तगालियों से किया युद्ध राजनीतिक के साथ ही धार्मिक भी था । हिंदुओं का धर्मांतरण करना तथा धर्मांतरित न होनेवालों को जीवित जलाने की शृंखला चलानेवाले पुर्तगाली पादरियों के ऊपरी वस्त्र उतार कर तथा दोनों हाथ पीछे बांधकर संभाजी महाराज ने गांव में उनका जुलूस निकाला ।’ – प्रा. श.श्री. पुराणिक (ग्रंथ : ‘मराठ्यांचे स्वातंत्र्यसमर (अर्थात् मराठोंका स्वतंत्रतासंग्राम’ डपूर्वार्ध़) छत्रपति संभाजी महाराज अत्यंत क्रोधित हुए क्योंकि गोवा में पुर्तगाली हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन के साथ साथ मंदिरों को ध्वंश भी कर रहे थे। छत्रपति संभाजी महाराज द्वारा किये जा रहे हमले से अत्यंत भयभीत होगे थे जो पोर्तुगाली के लिखे चिट्ठी में दर्शाता हैं : “ संभाजी आजके सबसे पराक्रमी व्यक्ति हैं और हमें इस बात का अनुभव हैं” ।
यह रहा पोर्तुगाली इसाई कसाइयों द्वारा लिखा हुआ शब्द-: (The Portuguese were very frightened of being assaulted by Sambhaji Maharaj, and this reflects in their letter to the British in which they wrote, ‘Now-a-days Sambhaji is the most powerful person and we have experienced it’. )
संभाजी महाराज गोवा की आज़ादी एवं हिन्दुओ के उप्पर हो रहे अत्याचारों का बदला लेने के लिए 7000 मावले इक्कट्ठा किया और पुर्तगालीयों पर आक्रमण कर दिया पुर्तगाली सेना जनरल अल्बर्टो फ्रांसिस के पैरो की ज़मीन खिसक गई महाराज संभाजी ने 50,000 पुर्तगालीयों सेना को मौत के घाट उतार दिया बचे हुए पुर्तगाली अपने सामान उठाकर चर्च में जाकर प्रार्थना करने लगे और कोई चमत्कार होने का इंतेज़ार कर रहे थे संभाजी महाराज के डर से समस्त पुर्तगाली लूटेरे पंजिम बंदरगाह से 500 जहाजों पर संभाजी महाराज के तलवारों से बच कर कायर 25000 से अधिक पुर्तगाली लूटेरे वापस पुर्तगाल भागे ।
संभाजी महाराज ने पुरे गोवा का शुद्धिकरण करवाया एवं ईसाइयत धर्म में परिवर्तित हुए हिंदुओं को हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया ।
पुर्तगाली सेना के एक सैनिक मोंटिरो अफोंसो वापस पुर्तगाल जाकर किताब लिखा (Dr**as da India) लिखता हैं संभाजी महाराज को हराना किसी पहाड़ को तोड़ने से ज्यादा मुश्किल था महाराज संभाजी के आक्रमण करने की पद्धति के बारे में से ब्रिटिश साम्राज्य तक भयभीत होगया गया था अंग्रेजो और हम (पुर्तगाल) समझ गए थे भारत को गुलाम बनाने का सपना अधुरा रह जायेगा।
संभाजी महाराज की युद्धनिति थी अगर दुश्मनों की संख्या ज्यादा हो या उनके घर में घुसकर युद्ध करना हो तो घात लगा कर वार करना चाहिए जिसे आज भी विश्व के हर सेना इस्तेमाल करती हैं जिसे कहते हैं Ambush War Technic। पुर्तगाल के सैनिक कप्तान अफोंसो कहता हैं संभाजी महाराज के इस युद्ध निति की कहर पुर्तगाल तक फैल गई थी संभाजी महाराज की आक्रमण करने का वक़्त होता था रात के ८ से ९ बजे के बीच और जब यह जान बचाकर पुर्तगाल भागे तब वहा भी कोई भी पुर्तगाली लूटेरा इस ८ से ९ बजे के बीच घर से नहीं निकलता था in लूटेरो को महाराज संभाजी ने तलवार की वह स्वाद चखाई थी जिससे यह अपने देश में भी डर से बहार नहीं निकलते थे घर के ।
हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया गया :
हम सभी जानते हैं छत्रपति शिवाजी महाराज के निकट साथी, सेनापति नेताजी पालकर जब औरंगजेब के हाथ लगे और उसने उनका जबरन धर्म परिवर्तन कर उसका नाम मोहम्मद कुलि खान रख दिया । शिवाजी महाराज ने मुसलमान बने नेताजी पालकर को ब्राम्हणों की सहायता से पुनः हिन्दू बनाया और उनको हिन्दू धर्म में शामिल कर उनको प्रतिष्ठित किया।
हालांकि, यह ध्यान देने की बात हैं संभाजी महाराज ने हिंदुओं के लिए अपने प्रांत में एक अलग विभाग स्थापित किया था जिसका नाम रखा गया 'पुनः परिवर्तन समारोह' दुसरे धर्म में परिवर्तित होगये हिन्दुओ के लिए इस समारोह का आयोजन किया गया था ।
हर्षुल नामक गाँव में कुलकर्णी ब्राह्मण रहता था संभाजी महाराज पर लिखे इतिहास में इस वाकया का उल्लेख हैं कुलकर्णी नामक ब्राह्मण को ज़बरन इस्लाम में परिवर्तित किया था मुगल सरदारों ने कुलकर्णी मुगल सरदारों की कैद से रिहा होते ही संभाजी महाराज के पास आकर उन्होंने अपनी पुन: हिन्दू धर्म अपनाने की इच्छा जताई संभाजी महाराज ने तुरंत 'पुनः धर्म परिवर्तन समारोह का योजन करवाया और हिन्दू धर्म पुनःपरिवर्तित किया ।
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कैसे छत्रपति संभाजी ने भारत में पुर्तगाली शक्ति को नष्ट कर दिया
पुर्तगाली
अंग्रेजों के भारत में कदम रखने से पहले ही, एक अन्य यूरोपीय साम्राज्य ने भारत के तटों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली थी—न केवल व्यापार के माध्यम से, बल्कि विजय, जबरन धर्म परिवर्तन और क्रूर धार्मिक जांच के माध्यम से भी। गोवा में मजबूती से जमे पुर्तगालियों ने मंदिरों को नष्ट कर दिया था, हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया था और इतिहास की सबसे क्रूर जांचों में से एक, कुख्यात गोवा जांच शुरू की थी। लेकिन इससे पहले उन्होंने जो कुछ भी सामना नहीं किया था, उसके विपरीत, पश्चिमी घाट से एक मराठा राजा उभरा जिसने उन्हें न केवल भूमि पर बल्कि समुद्र में भी चुनौती दी। उनका नाम छत्रपति संभाजी महाराज था।
पुर्तगाली भारत कैसे पहुंचे?
15वीं शताब्दी में, पोप निकोलस पंचम द्वारा जारी पोप के आदेशों ने पुर्तगाल को गैर-ईसाई क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करने और उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का दैवीय अधिकार प्रदान किया। वास्को दा गामा ने भारत में मसालों के व्यापार की तलाश में मुस्लिम-नियंत्रित क्षेत्रों को दरकिनार करते हुए लिस्बन से यात्रा शुरू की। वह 1498 में कालीकट पहुंचे, और एक दशक से कुछ अधिक समय बाद, बीजापुर सल्तनत के मुस्लिम शासन से त्रस्त स्थानीय हिंदुओं के समर्थन से अफोंसो डी अल्बुकर्क ने 1510 में गोवा पर कब्जा कर लिया। प्रारंभ में, पुर्तगालियों ने धार्मिक स्वतंत्रता का वादा किया, लेकिन 1540 के दशक तक, यह भ्रम टूट गया। जेसुइट मिशनरियों ने "कठोर धार्मिकता" की नीति लागू की। मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया, ब्राह्मणों को निष्कासित कर दिया गया, त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और ईसाई धर्म को एकमात्र वैध धर्म बना दिया गया। संत के रूप में विख्यात जेसुइट मिशनरी फ्रांसिस जेवियर ने गोवा में पवित्र धर्म जांच के लिए पैरवी की। उनकी मृत्यु के कुछ वर्षों के भीतर, 1560 में, एक धार्मिक न्यायाधिकरण की स्थापना की गई, जिसने यातनाओं का तांडव मचा दिया: सार्वजनिक रूप से जलाना, जल यातना, यातना देना और असंतुष्टों को नग्न अवस्था में सड़कों पर घुमाना। पवित्र हिंदू ग्रंथों को राख में बदल दिया गया।
मराठा-पुर्तगाली संबंध:
1667 तक, गोवा और सालसेट क्षेत्रों को जबरन धर्मांतरित कर शत प्रतिशत कैथोलिक घोषित कर दिया गया था। लेकिन प्रतिरोध पनप रहा था। स्वराज के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुर्तगालियों के क्षेत्रों पर आक्रमण किया था। 1680 तक, उनकी सेना गोवा में प्रवेश करने ही वाली थी कि छत्रपति की मृत्यु की खबर उनके सैनिकों तक पहुँची। कहा जाता है कि पुर्तगाली वायसराय ने खुशी मनाते हुए घोषणा की:
“ राज्य अब चिंता मुक्त है। वह शांति काल में युद्ध काल की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक था। ”
लेकिन वह उत्सव समय से पहले था। उनके पुत्र, छत्रपति संभाजी, इस विरासत को आगे बढ़ाएंगे और इससे भी कहीं अधिक प्रगति करेंगे।
छत्रपति संभाजी महाराज ने प्रारंभ में पुर्तगालियों के साथ शांति स्थापित करने का प्रयास किया, क्योंकि वे सिंहासन के उत्तराधिकार के संघर्ष से जूझ रहे थे। दोनों पक्षों के बीच शांति वार्ता चल रही थी और दोनों पक्षों के संबंध सौहार्दपूर्ण प्रतीत हो रहे थे।
औरंगजेब के बेटे, राजकुमार अकबर ने छत्रपति संभाजी के साथ शरण ली
राजपूताना में घटित घटनाओं ने दक्कन का भाग्य बदल दिया। निर्णायक मोड़ तब आया जब मुगल राजकुमार अकबर ने अपने पिता औरंगजेब के विरुद्ध विद्रोह करते हुए छत्रपति संभाजी की शरण ली। इससे मराठा औरंगजेब के प्रमुख निशाने पर आ गए। 1681 में, औरंगजेब और पुर्तगालियों ने स्वराज को कुचलने के लिए गठबंधन किया। बहादुर खान के नेतृत्व में मुगल सेना ने पुर्तगालियों की सहायता से कल्याण, जो एक महत्वपूर्ण तटीय केंद्र था, को घेर लिया।
पुर्तगालियों ने मुगल साम्राज्य—संभाजी महाराज के कट्टर शत्रु—को जहाज, रसद और खुफिया जानकारी की आपूर्ति शुरू कर दी। इसके बदले में, पुर्तगाली वायसराय ने उनकी सहायता के लिए पूरे कोंकण क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की मांग की। इस विश्वासघात ने गहरा घाव दिया। यह अब राजनीति नहीं, बल्कि व्यक्तिगत मामला बन गया था।
लेकिन छत्रपति संभाजी ने त्वरित और रणनीतिक गुरिल्ला युद्ध का प्रयोग करते हुए मुगल आपूर्ति लाइनों को तबाह कर दिया और 1683 तक उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। पुर्तगालियों के इस विश्वासघात के प्रतिशोध में, उन्होंने युद्ध की घोषणा कर दी।
औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध मराठा आक्रमण
जुलाई 1683 की एक तूफानी रात में मराठों ने अपना आक्रमण शुरू किया। संभाजी की सेना ने चेउल और कोरलाई के किलों पर हमला किया और साथ ही मुगल-समर्थक सिद्दी शासकों के नौसैनिक अड्डे जंजीरा पर भी आक्रमण किया। उन्होंने वसई पर धावा बोला और पुर्तगालियों के अनाज भंडारों को नष्ट कर दिया। इसके तुरंत बाद पारसिक किला भी उनके कब्जे में आ गया। पेशवा नीलकंठ मोरेश्वर के नेतृत्व में अतिरिक्त सेना ने चेउल पर बमबारी की, जबकि पुर्तगालियों द्वारा गोवा में अपने वायसराय से की गई अपीलें लगभग अनसुनी रह गईं, क्योंकि उन्हें गोवा पर मराठों के बड़े आक्रमण का डर था। वायसराय ने अपने नौसैनिक संसाधनों को गोवा की रक्षा पर केंद्रित कर दिया।
इस भीषण अभियान को देखकर अंग्रेजों ने भी बॉम्बे को संभाजी को 40,000 पैगोडा के बदले बेचने के लिए गुप्त बातचीत शुरू कर दी। संघर्ष तब और बढ़ गया जब पुर्तगालियों ने अपने उत्तरी क्षेत्र पर दबाव कम करने के लिए पोंडा किले की घेराबंदी करके दक्षिण कोंकण में एक नया मोर्चा खोलकर जवाबी हमला किया।
अनुभवी सेनापति येसाजी कंक के नेतृत्व में, मराठा सेना संख्या में कम होने के बावजूद डटी रही। छत्रपति संभाजी स्वयं 8,000 घुड़सवारों और 1,500 पैदल सैनिकों के साथ पहुंचे। 9 नवंबर, 1683 को, जब किले में अंतिम आक्रमण होने ही वाला था, उन्होंने 600 अतिरिक्त सैनिकों के साथ उत्तम घुड़सवार संरचना में किले पर आक्रमण किया। उनके आगमन से रक्षकों में जोश भर गया। मराठों ने जोरदार जवाबी हमला किया, जिससे पुर्तगालियों को पीछे हटना पड़ा और घेराबंदी पूरी तरह से छोड़नी पड़ी।
अब छत्रपति संभाजी के पक्ष में पूर्ण बल था। उसी महीने के अंत में, 40 मराठा सैनिक भेस बदलकर सैंटो एस्टेवाओ में घुस गए, पुर्तगाली सेनापति की हत्या कर दी और मुख्य सेना को हमला करने का संकेत दिया। पुर्तगाली वायसराय फ्रांसिस्को डी तावोरा घबरा गए और सैनिकों के साथ एक पहाड़ी पर स्थित गिरजाघर की ओर दौड़े, लेकिन मराठों के घात में फंस गए। यूरोपीय व्यापारी और आम नागरिक आसपास की पहाड़ियों से दिनदहाड़े इस पूरे युद्ध को देख रहे थे। शक्तिशाली यूरोपीय नौसेना की पराजय पूर्ण हो गई। पुर्तगाली सैनिक पीछे हटते हुए डूब गए, उनके शव उस शहर (गोवा) के पास से बहते हुए गुजरे जिस पर उन्होंने कभी शासन किया था। पहाड़ी पर स्थित गिरजाघर को भी स्वराज की आक्रमणकारी सेनाओं ने जलाकर राख कर दिया।
दिसंबर 1683 तक, संभाजी ने अपना अब तक का सबसे बड़ा अभियान चलाया। 6,000 घुड़सवारों और 10,000 पैदल सैनिकों के साथ, मराठों ने बारदेज़ और सालसेट के अत्यधिक किलेबंद क्षेत्रों पर धावा बोल दिया। एक के बाद एक किले आत्मसमर्पण करते चले गए। पानी की कमी से कमजोर हो चुका तिविम कुछ ही दिनों में गिर गया। पुर्तगाली सैनिकों से हथियार और कपड़े छीन लिए गए और उन्हें शर्मिंदा करके वापस भेज दिया गया। चर्चों को सैन्य अड्डों में बदल दिया गया और जेसुइट पादरी यूरोपीय सैनिकों और धर्मान्तरित मूल निवासियों के साथ मिलकर पुर्तगाली सेना का नेतृत्व कर रहे थे ताकि अपने क्षेत्रों की रक्षा कर सकें। इसी बीच, पुर्तगालियों के उत्तरी क्षेत्रों में, करंजा और एलिफेंटा द्वीप गिर गए, और आसपास के क्षेत्रों को स्वराज की सेनाओं ने तहस-नहस कर दिया।
फिर आया अंतिम अपमान। धर्म जांच के दौरान हिंदुओं को जिस प्रकार सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया था, उसके प्रतिशोध में छत्रपति संभाजी ने 140 धर्म प्रचारकों को उसी प्रकार नग्न अवस्था में जुलूस में शामिल करने का आदेश दिया, जैसे कभी हिंदुओं के साथ किया गया था। यह प्रतिशोध तो था ही, साथ ही एक संदेश भी।
पुर्तगाली वायसराय, पूर्ण पतन के भय से, बॉम जीसस के गिरजाघर में चले गए और संत जेवियर की समाधि पर प्रार्थना की। उन्हें पता था कि संभाजी गोवा पर अंतिम घेराबंदी की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन भाग्य को ही अपना भाग्य तय करना था। जैसे ही मराठा राजा ने अपने अंतिम आक्रमण की तैयारी की, शाह आलम के नेतृत्व में 100,000 सैनिकों की विशाल मुगल सेना कोंकण पर टूट पड़ी। संभाजी के सामने एक विकल्प था: गोवा को नष्ट करके दो महाशक्तियों के बीच कुचल जाने का जोखिम उठाना, या पीछे हटकर स्वराज की रक्षा करना। उन्होंने बुद्धिमानी भरा विकल्प चुना।
गोवा पर आक्रमण रोक दिया गया—लेकिन इसका परिणाम ऐतिहासिक रहा। हालाँकि संभाजी गोवा पर कब्ज़ा नहीं कर पाए, फिर भी उन्होंने पुर्तगालियों की अजेयता के भ्रम को चकनाचूर कर दिया। उनके किले खंडहर बन गए, उनका गौरव चूर-चूर हो गया, और मुगलों के मूक सहयोगी के रूप में उनकी भूमिका पूरी तरह उजागर हो गई। जिस साम्राज्य ने कभी भारतीय धरती पर अत्याचार किए थे, उसने अब अपने औपनिवेशिक इतिहास में अभूतपूर्व पराजय का स्वाद चखा।
छत्रपति संभाजी ने न केवल पुर्तगालियों से युद्ध किया, बल्कि उन्होंने उनके अहंकार को पत्थर-पत्थर करके, किले-किले करके ध्वस्त कर दिया।