28/05/2026
#सगाई, #शादी, ग्यारह साल का साथ, और #सालगिरह
वर्ष 2011 में मैंने बाहरवी परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी,और 18 वर्ष की दहलीज पार कर चुका था, गांवों में जैसे ही बी ए प्रथम वर्ष में दाखिला मालपुरा करवाया,तो उधर घरवालें और अन्य रिश्तेदार भी शादी -विवाह की बातचीत करने वाले थें, जहां भी जाते तो शादी विवाह की बातें होने लगती, धीरे-धीरे जगह-जगह से शादी के लिए रिश्ते आने लगे।
में आपको बताऊं हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा मजबूत नहीं थी, पिताजी एक साधारण से व्यक्तित्व के धनी थे और उनको चिंता थी कि जैसे भी हो लड़के की शादी हो जाये, क्योंकि हमारे परिवार में अन्य मेरी बहन के अलावा कोई लड़की नहीं थी, क्योंकि समाज में आटा-साटा प्रथा ( लडके की शादी के बदले उसकी पत्नी के भाई या अन्य रिश्तेदार के लिए लडकी देना) का प्रचलन था,
पिताजी व मेरे बीच में मेरी शादी को लेकर अक्सर मतभेद रहा करते थे, क्योंकि में कम उम्र में शादी करना नहीं चाहता था, और अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था, लेकिन परिवार वालों की चिंता अलग ही थी,
मेरे दादाजी भी कहां करते थे कि में मरने से पहले मेरे पोतें की शादी देखना चाहता हूं खेर ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था 2010 में ही दादाजी चल बसे और यह सब देख नहीं पाये। हमारा कच्चा मकान था जिसमें दो कमरे (साले) थी, तथा बाहर एक बरामदा (तबारी थी),तथा एक (कोटड़ी) बाहर की और थी जिसमें हमारे दादा-दादी रहा करते थे, जिससे सटाकर एक लकडी की थूणी(खम्भा) गाढ़कर एक किवाडीं बांध रखी थी जो कि हमारे मकान का मुख्य गेट( मेन गेट था) जिसकी दूसरी साईड में सूखे पत्थरों की एक दिवार बना रखी थी जिसके ऊपर विलायती बबूल की लड़कियों के गट्ठर( राजस्थानी में भारे) रखे हुए थे। उसी दोरान मालपुरा से एक सज्जन मुझे देखने आये में उस समय ट्रक से इटें खाली करने गया था,जब घर पर आया तो पुरा इटों की डस्ट (धूल) से लाल-छट हो रखा था,मुझे पता पड़ गया तो मकान के बाहर ही कपड़े मंगवाये गये और बाहर लगे हेडपंप पर ही नहाकर घर में घुसा। उनसे मेरी कोई ज्यादा बात नहीं हुई उन्होंने मेरी पढ़ाई के बारे में जानकारी ली, और वो चाय-पानी पीकर शाम तक चले गये, पारिवारिक स्थिति कमजोर होने व कुछ पढ़ाई का खर्चा उठाने के लिए में उस समय पढ़ाई के साथ-साथ ईंटें खाली करने,बजरी की ट्रोलिया भरने पत्थर ढोने सहित अन्य काम कर लेता था क्योंकि इस काम में 300-400 रूपये दिहाड़ी के मिल जाते थे,जिससे कुछ कपड़ों व अन्य पढाई का खर्चा निकल जाता था। उसी दौरान मालपुरा में बाबा रामदेव जी के मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी तो हम दोनों भाई भी उस कार्यक्रम के दौरान बुआ के गये हुए थे,तो वहां पर हमको बारी-बारी से ससुराल पक्ष की और से देखा गया, कुछ दिनों बाद हमारी दोनों भाईयों मेरी व छोटे भाई की सगाई दोनों बहनों के साथ हो गई, इसके बाद तीन साल तक हमारी सगाई रही तो लोग फालतु की बाते करने लग गये कि मालपुरा वाले शादी करेंगे या नहीं, करेंगे तो कब करेंगे या सगाई तोड़ देंगे,कुछ लोगों के द्वारा भी सगाई तोड़ने के प्रयास किये गये लेकिन वो लोग भी जबान के पक्के थे और पिताजी कहां करते थे कि मैंने किसी के साथ गलत नहीं किया तो मेरे बच्चों के साथ गलत होगा। उसी के बाद हमनें दो कमरे का निर्माण करने का प्रयास कर ढांचा खडा कर दिया, जिसमें पत्थर की चिनाई में अन्दर के हिस्से की तरफ में काम करता व बाहर की फेश पर पिताजी, शाम को रात्रि में चुना सांधने का काम करते, कुल-मिलाकर कौशिश यह रहती की कम से कम पैसे लगे, दिनभर खूब मेहनत करते।
28 मई 2015 को शादी की तारीख तय की गई हम दोनों भाईयों का लग्न 18 दिन पहले 10 मई 2015 को भैजा गया, हमारे यहां नाई या पंडित जी लग्न नहीं लाते तो हमारे जीजाजी ही लग्न लेकर के आये।
शाम को लग्न झिलानें (सम्हालने) के लिए समाज के पंचों को बुलाया गया,हमारे आंगन ( चोक) में बाजोट (चौकी) लगाकर हम दोनों भाईयों को बिटाया गया। हमारे लग्न में पंडित नही बुलाते हैं तो रामस्वरूप जी ने लग्न को झिलाने की रश्म अदा की। एक बड़े से पंपलेट में (लग्न पत्रिका) में लग्न लिखा हुआ था जिसमें कुछ चावल(अक्षत) के दाने 2 अंगूठी, आदि को पम्पलेट के बिच में रखकर उसे फोल्ड करके लच्छे से लपेट रखा था, लग्न पत्रिका को खोलकर समाज के पंचों को लग्न की तारीख बताई गई, तथा साथ में आयें कपड़े आ ओढायें गये, महिलाओं ने मंगल गीत गाये,व समाज के पंचों को गुड का वितरण किया गया।
फिर दूसरे दिन हमारी चिंता बढ़ गई और शादी के लिए पैसों की व्यवस्था करने में पसीने छूट गए। रूपयों के बंदोबस्त के लिए कहीं रिश्तेदारों से संपर्क किया गया। एक दो रिश्तेदारों ने हामी भरी और कुछेक रूपये दिए, इसके अलावा पापा जी ने कभी गांव में ज्यादा लेनदेन नहीं करी फिर भी एक दो लोगों ने इस दौरान मदद की। जैसे तैसे शादी के लिए रूपयों की व्यवस्था की गई। 18 दिन का लगन होने के चलते बनाए गए दो कमरों के ढांचे में प्लास्टर, फर्श, गेट, जंगले पुताई आदि का काम बाकी था सबसे पहले वह काम करना पड़ा फिर भी एक कमरे के गेट जंगला लगाना शेष रह गया।
इसके बाद में 11 दिन पहले छोटे विनायक की स्थापना की गई, रणथंबोर गणेश जी, बाबा रामदेव जी सहित अन्य देवताओं के नाम कूकूपत्री में लिखे गए और निमंत्रण भेजे गए, आधुनिक युग में होने के कारण सीधे कंप्यूटर ऑफसेट पर जाकर शादी के कार्ड छपवाए गए थे। वरना प्राचीन समय में तो पिलें चावल दिए जाते थे। हमारे यहां पर समाज में गूगरी (गेहूं के दाने को उबालकर बनाया गया व्यंजन) बांटने की प्रथा का रिवाज है जिसे यह पता चल जाता है कि जो व्यक्ति गूगरी नहीं लेता है,उसको यह मान लिया जाता है कि वह व्यक्ति शादी में शामिल नहीं होगा, और जो व्यक्ति गूगरी लेता था उसी के ही बंदौरे खाये जाते थे, खैर खूब बंदौर खाये गए 1 दिन में दो-चार-दो-चार घरों में बंदोरे खा गए। हमारे घर से सभी ने ही गूगरी ले ली थी, क्योंकि पिताजी ने कभी किसी के काम को बिगाड़ा नहीं या किसी के भी काम में अड़चन नहीं लगाईं थी।
इसके बाद मेरी मां, पिताजी और मैं मामा के यहां बत्तीसी (गुड की भेली) लेकर गये, निमंत्रण के साथ मायरे हेतु निमंत्रण दिया।
शादी के 5 दिन पहले बड़े बिंदायक (तेल) की स्थापना हुई उसे दिन शाम को पूये बनाए गये जो कि समाज के कुछ परिवारों का हमारा धड़ा था उसमें प्रत्येक व्यक्ति के नाम से पूये बाटें गए। तथा कच्ची सुत से बने हुए काकण डोरे हमारी कलाई पर बांधें गये।
उसी दिन घर पर आधुनिक लाउडस्पीकर लाये गए, और लगातार 5 दिनों तक घर पर गीत गाने वाली महिलाओं व रिश्तेदारों ने खूब नृत्य किया गया। महिलाएं उस समय खूब अलग-अलग तरह के गीत गाया करती थी जिसमें बन्ना-बन्नी, लाडा-लाडी, साझे,हल्दी आदि के गीत गाये जाते थे।
हल्दी (पीट्टी) उबटन की रिवाज का प्रचलन भी बड़े विनायक की स्थापना से ही हो गया था, जो उबटन (पीट्टी) (जों के आटें व हल्दी) से बनाई जाती थी, प्राचीन समय में वही व्यक्ति के शरीर को गोरा करने का एक सशक्त माध्यम था। मौहल्ले की महिलाओं व भाभियों के द्वारा पीटी की रस्म अदा की जाती थी।
27 को मेल व प्रितिभोज का कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें शाम को हमारे हेसीयत के हिसाब से दाना (नुक्ति,बुंदी) पूडी, नमकीन का भोज दिया गया। दोनों भाइयों की शादी होने के कारण काम में काफी अडचने भी आई, क्योंकि काम करने वाला कोई नहीं था, फिर भी मेरे दोस्तों में विशेष रूप से अंकित, गणेश,व मेरे जीजाजी का सहयोग रहा।
शाम को शादी में आई महिला रिश्तेदारों के द्वारा कुम्हार के यहां से चाक पूजकर मिट्टी के बर्तन( राजस्थानी में बैवडे, कलश) शिर पर लाये गये और उनको शिर से उतारने की रस्म जीजाजी के द्वारा की गई, और उन कलशों को देवताओं के कमरे में रखा गया।
इस दौरान मामा के यहां से मायरा आ गया, मायरा में पहुंचे हुए लोगों को समाज के पंच पटेलों के साथ जाकर उन्हें घर पर लाया गया, भोजन के बाद शाम को मायरे की रस्में अदा की गई कपड़े पहनाए गये और हमारे निकासी (बिन्दोरी) निकालने की तैयारी की गई, उसी दौरान हमको तैयार किया गया, तब वहां मेरे दोस्तों द्वारा हमें तैयार किया गया,तो हमारे मेकअप के किसी पाउडर को लेकर मामाजी के लड़के से कहासुनी हो गई, और वो कहासुनी विवाद में बदल गई इसके बाद मामा जी के यहां पर दो-तीन साल आना-जाना बंद हो गया, फिर उसके बाद में आधुनिक युग के पिकअप डीजे के गानों पर घोड़ी पर बैठ कर हमारे दोनों भाईयों निकासी (बिंदोरी) निकाली गई, गांव के मुख्य मंदिर बालाबेरी बालाजी, ठाकुर जी के मंदिर ( बंशीवाले के मंदिर), बाबा रामदेव जी के मंदिर में हमनें दर्शन किये।
मेरे गांव का सामाजिक ताना-बाना इतना मजबूत है कि यहां पर आज तक कोई किसी दुल्है को (घोड़ी पर उतारने) की घटना घटित नहीं हुई किसी भी व्यक्ति को, किसी मंदिर में प्रवेश करने से नहीं रोका गया, गांव में दलित, मुस्लिम,अगड़ी व पिछड़ी जातियों में सामाजिक सद्भाव देखते ही बनता है,गांव में आपसी भाईचारा सौहार्दपूर्ण है।
अब आया पाणिग्रहण संस्कार का वो दिन सुबह पहले समाज के लोगों को इकट्ठा किया गया और बारात में चलने के लिए सभी को न्योता दिया गया, पंचों को पटला ( दुल्हन के लिए लाया गया श्रृंगारदान,कपडें, पंच मेवा, बिन्द खोतली(थेली) आदि)
सम्भलाया गया व कुछ सामाजिक जिम्मेदारी निभाई गई,
हमारे यहां नुत्ता रखने की प्रथा है जिसको कहीं-कहीं पर भान भी कहा जाता है, इस प्रथा में समाज के हर घर में नुत्ते के हिसाब से एक बही रखी जाती है और उस बही में आवता और नवादु दो कॉलम होते हैं, इसके माध्यम से समाज के लोगों के द्वारा कुछ नकद राशि रखी जाती है जिससे शादी वाले परिवार को कुछ मदद हो जाती है।
शाम को लगभग 4:00 बजे बारात यहां से मालपुरा के लिए रवाना हुई। में अल्टों कार में और छोटा वाला बोलेरो में गये।
वहां मालपुरा में शिव जी के मंदिर पर हमारी बारात को रोका गया नाश्ता दिया गया और उसके बाद सामेला की रश्म अदा की गई, वहां पर तिन दुल्हों की निकासी निकल गई हमारे दोनों भाइयों के अलावा एक बारात हमारे साढू भाई की वहां पर आई थी, राम-राम किया गया उसके बाद, तोरण भी संपन्न हुआ। हम लोगों को खाना खिला कर पाणिग्रहण संस्कार फेरों के लिए बिठा दिया गया, लगभग 2 घंटे के अंदर फेरे संपन्न हुए, उसमें सात वचन एक दूसरे (वधू और दूल्हे से लिए गये), हमने भी श्रीमती जी के साथ जीवन मरण के इस यज्ञ में साथ निभाने के लिए वचन दिया। पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ।
दूसरे दिन अन्य कहीं सामाजिक रश्मों को निभाकर हमारे को विदा किया गया, विदाई का पल दिल को झकझोर कर देने वाला था, कैसे एक पिता अपनी बेटी का पालन-पोषण करता है और उसके बाद इस तरह से विदा करता है,वाकही मां पिता से बढ़कर त्याग कोई नहीं कर सकता।
शाम तक हम लोग भी शादी करके गांव पहुंच गए, गांव पहुंचने के बाद मोहल्ले की महिलाओं के द्वारा हमारी अगवाई की गई, दूसरे दिन सुबह की पवित्र बैला में डोरडे (काकण डोरा)खुलवाये गये, जिसमें श्रीमती जी ने मेरी कलाई से उन काकण डोरों को दोनों हाथों से खोला व मैंने एक हाथ से डोरडे खोले, फिर एक स्टील की परात (दुकड़े) में पानी डालकर, उस पानी में हल्दी,व थोड़ा दूध डाला गया और उस पानी को गहरा पीला गया, हमारे जीजाजी द्वारा खोले गये डोरडो के साथ हरि धोब(घास), एक सुपारी,एक सिक्का व एक अंगूठी को मिलाकर सात बार काकण डोरा का खेल खिलाया गया, जिसमें मुझे एक हाथ से सिक्के को उस गहरे पीले हल्दी वाले पानी में, व श्री मतीजी को दोनों हाथों से ढूंढना था, खेर अंत में विजय मैरी ही हुई, फिर हमारे को गांव के सभी देवताओं को ढोकने जाना पड़ा, इस दौरान कहीं प्रथाएं सोटी-सोटी,की रशमें निभाई गई, जिसमें एक-एक नीम की पतली लकड़ी (टहनी) दोनों पति-पत्नी को दी गई और फिर एक घैरे में गोल-गोल घुमते हुए एक दूसरे को हल्के से मारा जाता है।
यहां मैं बहुत सारी प्रथम को छोड़ दिया है उनके बारे में किसी दिन विस्तार से चर्चा करेंगे,- जैसे ,रोडी-पूजना,घोड़ी, अन्य प्रथाओं का जिक्र फिर किसी दिन करेंगे।
इस प्रकार 28 मई 2015 को हमारा पाणीग्रहण संस्कार संपन्न हुआ और मैं एक वैवाहिक बंधन में बन्द गया, शादी के बाद हमारा वैवाहिक (गृहस्थी) जीवन काफी अच्छे से बीत रहा है हमारे श्रीमती जी का सहयोग मुझे हमेशा मिलता रहा है। मेरे हर सामाजिक कार्य में किसी ने किसी रूप में मेरे जीवन संगिनी श्री मती जी का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हाथ रहा है, कभी-कभी हमारे बीच में छोटी-छोटी बातों को लेकर भी मन मुटाव हो जाता हें, लेकिन हम एक दूसरे को मना लिया करते हैं, हमारे वैवाहिक जीवन की गाड़ी अच्छे संबंधों के साथ में बढ़िया चल रही है, मेरे जीवन में कहीं उतार चढ़ाव आये उन सभी में हमारे श्रीमती का योगदान अविस्मरणीय रहा है,
अतः आज 28 मई है और हमारी शादी की सालगिरह है आज 11 साल हमने वैवाहिक जीवन के पूर्ण कर लिए हैं, इसके लिए मैं मेरे जीवन संगिनी मंजू कुमारी को हृदय की गहराइयों से वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाएं इस लेख के माध्यम से प्रेषित करता हूं, और आप लोगों के आशीर्वाद की कामना करता हूं। साथ ही छोटे भाई की भी सालगिरह है तो सुमन व भागचंद को भी वैवाहिक वर्षगांठ पर हार्दिक शुभकामनाएं व सुखद दाम्पत्य जीवन की मंगल कामना।
आपका अपना
#नोरत_मल_वर्मा_लाम्बाहरिसिंह