15/04/2021
केदार नाथ घाटी के इस देवता से सूखा पडने पर वर्षा मांगने से निश्चित हो जाती है वर्षा !
केदारनाथ के निकट के अनेक गाँवों ( गुप्तकाशी , जग्गी , जाल . त्रियुगी नारायण ) मेँ प्रतिवर्ष ठीक वैशाख मास की 2 गते / प्रविष्ट ( लगभग 14 अप्रैल) को जाख देवता का नृत्य होता है । जिस आदमी पर यह देवता अवतरित होता है वह 88 कुन्तल से भी अधिक कोयलोँ के लाल अंगारों मेँ ढोल सागर की थाप पर नंगे पावों देर तक नृत्य करता है ( इसी साल के जग्गी गांव की तसवीर दी है ) । 3 दिन पहले से विशाल अग्निकुण्ड तैयार किया जाता है । इन गाँवों का देवता जाख भक्त लोगों की वर्षा या धूप की फरियाद अवश्य पूरी करता है। कभी भी सूखा पडने पर ढोल सागर से यह देवता अवतरित किया जा सकता है और वर्षा की मांग की जा सकती है । यह देवता अपने पास वर्षा के जल की मात्रा भी बता देता है कि वह कितना वर्षा कर सकता है अथवा नहीं ! इसी वजह से शायद इस क्षेत्र में प्राय: वर्षा होती रहती है । जाख यक्ष का दूसरा रूप है। वनवास में रह रहे पांडव जब एक पोखर में प्यास बुझाने पहुँचे तो पोखर के रखवाले यक्ष के जवाब न देने के कारण मर गये। अन्ततः युधिष्ठिर ने सभी प्रश्नों का उत्तर देकर अपने भाइयों के प्राण बचाये। किंवदन्ती है कि वह जलाशय यही है। अब उस जलाशय में पेड़ों के टुकड़े काटकर धधकती अग्नि में जाख देवता लाल-लाल अंगारों पर नाचता है। माना जाता है कि उस पल देवता को कोयलों की जगह पानी ही नजर आता है। आश्चर्य वाली बात यह है कि नर देवता लगभग 3 मिनट तक इस अग्निकुण्ड में नाचता है, परन्तु उसके नंगे पैरों पर लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता । लोग आँखें फाड़कर इस दृश्य को देखते हैं। इस दिन हजारों की संख्या में स्थानीय लोगों के साथ देश-विदेश के पर्यटक भी उपस्थित रहते हैं। परदेशी बेटियाँ अपनी ‘खुद’ मिटाने के लिये अपने मायके के लोगों के साथ कुछ क्षण बिता कर प्रसन्न होने की कोशिश करती हैं। अल्हड़ कुँवारी लड़कियाँ चूड़ियों की दुकानों से रंग-बिरंगी चूड़ियाँ खरीदती हैं। विवाहितायें इन चूड़ियों को भगवान् जाख का प्रसाद समझ लम्बे समय तक सुहागिन बनने की चाह के साथ पहनती हैं। अग्निकुण्ड की राख लोग अपने घर ले जाते हैं। मान्यता है कि यह भभूत हर मर्ज की दवा है। यह रहस्य अभी भी वैज्ञानिकों के लिये खोज का विषय है।