29/07/2026
प्रेरक कथा- संत की शिष्य को सीख:
पुराने समय की लोक कथा है। एक संत अपने शिष्य के साथ गांव-गांव जाकर भिक्षा मांगते थे। वे लोगों को धर्म, सेवा और अच्छे कर्मों का महत्व भी समझाते थे। एक दिन चलते-चलते वे एक छोटे से घर के बाहर पहुंचे। संत ने भिक्षा के लिए आवाज लगाई।
आवाज सुनकर एक छोटी बच्ची घर से बाहर आई। उसने संत को प्रणाम किया और बोली, "बाबा, हम बहुत गरीब हैं। हमारे घर में ऐसा कुछ नहीं है जो मैं आपको दे सकूं। आप कृपया आगे चले जाइए।"
संत ने बच्ची की बात सुनी और मुस्कुराते हुए बोले, "बेटी, ऐसा मत कहो। अगर तुम्हारे पास हमें देने के लिए कुछ नहीं है, तो अपने आंगन की थोड़ी-सी मिट्टी ही दे दो।"
बच्ची ने बिना सोचे तुरंत आंगन में जाकर एक मुट्ठी मिट्टी उठाई और संत के भिक्षा पात्र में डाल दी। संत ने प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दिया और अपने रास्ते पर आगे बढ़ गए।
कुछ दूर चलने के बाद शिष्य ने संत से पूछा, "गुरुदेव, मैं समझ नहीं पाया। आपने भिक्षा में मिट्टी क्यों स्वीकार की? मिट्टी का क्या उपयोग होगा?"
संत ने शांत भाव से जवाब दिया, "तुम्हें यह मिट्टी दिखाई दे रही है, लेकिन मैं इस बच्ची के संस्कार देख रहा हूं। आज यह छोटी है। अगर आज इसे किसी की मदद करने से मना करना सीखने को मिल गया, तो भविष्य में भी यह दूसरों की सहायता करने से बच सकती है।"
उन्होंने आगे कहा, "लेकिन आज इसने अपनी क्षमता के अनुसार कुछ देने की कोशिश की है। भले ही वह केवल एक मुट्ठी मिट्टी है, लेकिन इसके मन में दान और सेवा की भावना का बीज बो दिया गया है। जब यह बड़ी होगी और इसके पास धन-संपत्ति होगी, तब यही भावना इसे जरूरतमंदों की मदद करने के लिए प्रेरित करेगी।"
संत बोले "वत्स, मैंने मिट्टी नहीं ली। मैंने उस बच्ची की श्रद्धा, समर्पण और सेवा का भाव लिया। देखो, बचपन में जो संस्कार पड़ जाते हैं वो जीवनभर साथ रहते हैं। अगर आज हमने बच्चों को दया, सेवा और श्रद्धा सिखा दी, तो कल वो अच्छे इंसान बनेंगे। इसलिए माता-पिता और गुरु का सबसे बड़ा कर्तव्य है कि वो बच्चों को छोटी उम्र से ही अच्छे संस्कार दें।"
शिष्य को गुरु की बात समझ आ गई। उसे एहसास हुआ कि अच्छे संस्कार बचपन से ही दिए जाते हैं। छोटी उम्र में सीखी गई आदतें ही आगे चलकर व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा बन जाती हैं।
हैं।
" प्रसंग की सीख"
छोटे-छोटे कामों की जिम्मेदारी देने से बच्चों में आत्मनिर्भरता और दूसरों के प्रति जिम्मेदारी का भाव बढ़ता है। अच्छे संस्कार एक दिन में नहीं आते। लगातार प्रयास, सही मार्गदर्शन और परिवार के अच्छे वातावरण से बच्चे ऐसे इंसान बनते हैं जो समाज के लिए उपयोगी और संवेदनशील होते हैं।
बचपन में जो आदतें डाली जाती हैं, वे जीवनभर साथ रहती हैं।
इसलिए छोटी उम्र से ही बच्चों को दया, सेवा और अच्छे संस्कार देना जरूरी है।
क्योंकि आज का बच्चा ही कल का भविष्य है।
विचार: ूज्य_स्वामी_अवधेशानंद_गिरी_महाराज_जी
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आइए हम अपने गुरुजनों को नमन करें।
गुरु पूर्णिमा की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
Manoj Kohli "Shyam"
अध्यक्ष नगर पालिका परिषद चिन्यालीसौड़