03/09/2026
बहुत समय पहले की बात है। जब धरती पर अधर्म बढ़ने लगा था और अत्याचारी कंस के कारण मथुरा की प्रजा भय में जी रही थी, तब भगवान श्रीहरि विष्णु ने देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेने का संकल्प किया। उसी दिव्य समय में भगवान विष्णु के परम सेवक और अनंत स्वरूप माने जाने वाले शेषनाग भी अपनी अद्भुत लीला के साथ पृथ्वी पर प्रकट हुए। वे किसी साधारण सर्प के समान नहीं थे। शेषनाग को अनंत कहा गया, क्योंकि उनकी कोई सीमा नहीं मानी जाती। धार्मिक परंपरा में उन्हें भगवान विष्णु की शय्या, सेवक और दिव्य शक्ति का स्वरूप माना गया है। जब भगवान विष्णु पृथ्वी पर श्रीकृष्ण के रूप में आए, तब शेषनाग भी उनके साथ एक विशेष रूप में अवतरित हुए। यही कारण है कि कृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर उनके जीवन के अनेक प्रसंगों में शेषनाग का संबंध दिखाई देता है।
कृष्ण जन्म की वह रात अत्यंत अद्भुत थी। मथुरा की कारागार में आधी रात के समय देवकी ने भगवान श्रीकृष्ण को जन्म दिया। चारों ओर अंधकार था, लेकिन कारागार के भीतर एक दिव्य प्रकाश फैल गया। वासुदेव ने जब उस बालक को देखा तो उन्हें समझ आ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं भगवान हैं। भगवान ने वासुदेव से कहा कि वे उन्हें गोकुल ले जाएं और वहां नंद बाबा के घर छोड़ आएं। उसी समय भगवान की माया से कारागार के पहरेदार गहरी नींद में सो गए और वासुदेव की बेड़ियां अपने आप खुल गईं। वासुदेव ने बालक कृष्ण को एक टोकरी में रखा और उन्हें सिर पर उठाकर कारागार से बाहर निकल पड़े।
बाहर भयंकर वर्षा हो रही थी। रात का अंधकार इतना गहरा था कि कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। वासुदेव धीरे-धीरे यमुना के तट की ओर बढ़े। जब वे यमुना के पास पहुंचे तो नदी उफान पर थी। लहरें तेज थीं और चारों ओर वर्षा हो रही थी। वासुदेव के सामने सबसे बड़ी चिंता यह थी कि नवजात बालक को सुरक्षित गोकुल कैसे पहुंचाया जाए। उन्होंने भगवान का नाम लिया और यमुना में उतर गए। पानी धीरे-धीरे बढ़ता गया। तभी एक अद्भुत घटना घटी।
आकाश में तेज बिजली चमकी और उसी क्षण वासुदेव ने अपने पीछे एक विशाल दिव्य छाया देखी। वह कोई साधारण छाया नहीं थी। वह स्वयं शेषनाग थे। उन्होंने अपने विशाल फनों को फैलाकर बालक कृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया। वर्षा की बूंदें उनके फनों पर गिर रही थीं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण तक एक बूंद भी नहीं पहुंच रही थी। वासुदेव आगे बढ़ते रहे और शेषनाग उनके साथ-साथ चलते रहे। ऐसा लग रहा था जैसे स्वयं अनंत भगवान की रक्षा के लिए उनके सेवक पृथ्वी पर उतर आए हों।
यमुना का जल उस समय तेज बह रहा था। लेकिन जैसे ही भगवान कृष्ण के चरण यमुना के जल से स्पर्श हुए, नदी का प्रवाह शांत होने लगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार यमुना भी भगवान की परम भक्त थीं और उनके चरणों का स्पर्श पाकर उनका वेग शांत हो गया। वासुदेव ने धीरे-धीरे नदी पार की और गोकुल की ओर बढ़ गए। उनके सिर पर भगवान कृष्ण थे और ऊपर शेषनाग अपने विशाल फनों से उनकी रक्षा कर रहे थे। वह दृश्य इतना दिव्य था कि मानो स्वयं प्रकृति भी उस रात भगवान के स्वागत में खड़ी हो।
वासुदेव जब नंद बाबा के घर पहुंचे तो वहां सभी लोग गहरी नींद में थे। उन्होंने बालक कृष्ण को यशोदा के पास सुला दिया और वहां जन्मी योगमाया को लेकर वापस मथुरा लौट आए। इस तरह कृष्ण गोकुल पहुंच गए और उनकी बाल लीलाओं का आरंभ हुआ। लेकिन शेषनाग और कृष्ण का संबंध यहीं समाप्त नहीं हुआ था। आगे चलकर वृंदावन की धरती पर एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरे संसार को यह दिखा दिया कि भगवान के भक्त और भगवान के बीच कैसा अद्भुत संबंध होता है।
गोकुल और वृंदावन में कृष्ण अपने बाल मित्रों के साथ गाय चराने जाते थे। वे कभी बांसुरी बजाते, कभी अपने मित्रों के साथ खेलते और कभी यमुना के किनारे पहुंच जाते। उसी यमुना में एक अत्यंत विषैला नाग रहता था, जिसका नाम कालिय था। कालिय के विष के कारण यमुना का एक हिस्सा दूषित हो गया था। कहा जाता है कि उसके विषैले प्रभाव से वहां का वातावरण भी भयावह हो गया था। पक्षी उस स्थान के ऊपर से उड़ते हुए गिर जाते थे और कोई भी जीव उस जल के पास जाने का साहस नहीं करता था।
एक दिन कृष्ण अपने मित्रों के साथ खेलते हुए उसी स्थान के पास पहुंच गए। उन्होंने देखा कि यमुना का जल शांत दिखाई दे रहा था, लेकिन उसके भीतर भयंकर विष फैला हुआ था। कृष्ण ने निश्चय किया कि इस संकट को समाप्त करना आवश्यक है। वे एक वृक्ष पर चढ़े और वहां से यमुना में छलांग लगा दी। पानी में हलचल मच गई। कालिय नाग क्रोधित होकर बाहर आया। उसके अनेक फन उठे हुए थे और उसकी आंखों में क्रोध था। उसने कृष्ण को अपने सामने देखकर उन्हें रोकने का प्रयास किया।
लेकिन कृष्ण कोई साधारण बालक नहीं थे। कालिय ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया, परंतु कृष्ण उसके बंधन से निकल गए। फिर भगवान उसके फनों पर चढ़ गए। कालिय बार-बार अपने फन उठाता और कृष्ण उन्हें शांत करते जाते। वृंदावन के लोग दूर खड़े होकर यह दृश्य देखकर चिंतित थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह छोटा सा बालक इतने विशाल नाग के सामने कैसे खड़ा है।
कृष्ण ने कालिय के फनों पर नृत्य करना शुरू किया। जिस नाग को अपनी शक्ति पर इतना गर्व था, उसकी शक्ति धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। अंततः कालिय समझ गया कि जिसके सामने वह खड़ा है, वह कोई साधारण बालक नहीं है। वह स्वयं परम शक्ति हैं। कालिय की पत्नियां भी वहां आईं और भगवान से प्रार्थना करने लगीं कि उनके पति को क्षमा कर दें। भगवान कृष्ण ने कालिय को आदेश दिया कि वह यमुना छोड़कर समुद्र की ओर चला जाए और फिर कभी वृंदावन के लोगों को परेशान न करे। कालिय ने भगवान की आज्ञा स्वीकार की और वहां से चला गया।
लेकिन कृष्ण और शेषनाग की कथा का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। महाभारत के समय भगवान कृष्ण के साथ जो व्यक्ति सदैव उनके निकट रहा, वह थे बलराम। धार्मिक परंपरा में बलराम को शेषनाग का अवतार माना जाता है। यही कारण है कि कृष्ण और बलराम का संबंध केवल भाइयों का नहीं बल्कि भगवान और उनके अनंत सेवक का भी माना जाता है। कृष्ण जहां भी गए, बलराम उनके साथ रहे। बचपन में दोनों ने गोकुल और वृंदावन में अनेक लीलाएं कीं और बाद में मथुरा तथा द्वारका में भी साथ रहे।
जब कंस ने कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया, तब दोनों भाई वहां पहुंचे। कंस ने उन्हें रोकने के लिए अनेक योजनाएं बनाईं, लेकिन अंततः कृष्ण ने कंस का अंत किया और मथुरा को उसके अत्याचार से मुक्त कराया। इस पूरे समय बलराम कृष्ण के साथ रहे। उनके हाथ में हल और मूसल होते थे और वे अपनी शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। कृष्ण और बलराम की जोड़ी को देखकर लोग कहते थे कि जैसे भगवान विष्णु और शेषनाग स्वयं पृथ्वी पर साथ-साथ चल रहे हों।
समय बीतता गया और कृष्ण द्वारका पहुंचे। वहां उन्होंने एक विशाल नगर बसाया। कृष्ण के जीवन में अनेक युद्ध और संकट आए, लेकिन बलराम हमेशा उनके साथ खड़े रहे। शेषनाग का यह स्वरूप केवल शक्ति का प्रतीक नहीं था। वह सेवा, समर्पण और भगवान के प्रति अटूट निष्ठा का प्रतीक माना जाता है। जिस प्रकार शेषनाग भगवान विष्णु के लिए अपनी पूरी सत्ता समर्पित करते हैं, उसी प्रकार बलराम ने भी कृष्ण के जीवन में भाई, सहयोगी और रक्षक के रूप में उनका साथ निभाया।
शेषनाग को अनंत क्यों कहा जाता है, इसकी भी एक गहरी धार्मिक मान्यता है। कहा जाता है कि जब सृष्टि का प्रलय होता है और सब कुछ समाप्त हो जाता है, तब भी अनंत शेष का अस्तित्व बना रहता है। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं और उनके फनों की छाया भगवान की रक्षा करती है। इसलिए शेषनाग को केवल नागराज नहीं बल्कि भगवान की अनंत सेवा में समर्पित दिव्य शक्ति के रूप में देखा जाता है।
कृष्ण के जन्म की रात यमुना के किनारे शेषनाग का छत्र बनना हो या बलराम के रूप में उनका कृष्ण के साथ पृथ्वी पर रहना, दोनों घटनाओं में एक ही भाव दिखाई देता है। भगवान और उनके भक्त का संबंध केवल पूजा का संबंध नहीं होता। वह प्रेम, विश्वास और सेवा का संबंध होता है। शेषनाग ने भगवान के लिए अपना सब कुछ समर्पित किया और इसी कारण उन्हें अनंत सेवा का प्रतीक माना गया।
कहा जाता है कि भगवान कृष्ण जहां होते हैं, वहां उनकी लीला को समझने के लिए केवल उनकी शक्ति को देखना पर्याप्त नहीं है। उनके आसपास रहने वाले भक्तों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वासुदेव जब कृष्ण को लेकर यमुना पार कर रहे थे, तब शेषनाग ने वर्षा से उनकी रक्षा की। वृंदावन में जब कृष्ण ने कालिय के अहंकार को समाप्त किया, तब उन्होंने यमुना को फिर से जीवन दिया। और जब कृष्ण ने पृथ्वी पर अपनी लीलाएं कीं, तब बलराम उनके साथ रहकर उनकी सहायता करते रहे।
इस कथा का सबसे सुंदर संदेश यही है कि सच्ची शक्ति वही है जो किसी की रक्षा के लिए प्रयोग हो। शेषनाग के पास अपार शक्ति थी, लेकिन उन्होंने उस शक्ति का प्रदर्शन अपने लिए नहीं किया। उन्होंने भगवान की सेवा और रक्षा के लिए उसे समर्पित किया। भगवान कृष्ण ने भी कालिय को केवल दंड नहीं दिया, बल्कि उसे सुधारने का अवसर दिया। यही कारण है कि कृष्ण और शेषनाग की कथा केवल एक चमत्कार की कहानी नहीं है, बल्कि भक्ति, सेवा, समर्पण और धर्म की कहानी है।
आज भी जब श्रीकृष्ण के जन्म की कथा सुनाई जाती है और उस रात का वर्णन होता है, तो बालक कृष्ण के ऊपर फैले शेषनाग के विशाल फनों का दृश्य श्रद्धा से याद किया जाता है। एक ओर सिर पर टोकरी में विराजमान नन्हे कृष्ण और दूसरी ओर उनके ऊपर सुरक्षा कवच बनाकर खड़े अनंत शेष। तेज वर्षा, उफनती यमुना, अंधेरी रात और उस सबके बीच भगवान की दिव्य यात्रा। यह दृश्य भक्तों के मन में आज भी भगवान की उस लीला की याद दिलाता है जिसमें प्रकृति की हर शक्ति जैसे उनकी सेवा में लग गई थी।
और शायद यही कृष्ण और शेषनाग की पूरी कथा का सबसे बड़ा रहस्य है। भगवान चाहे बालक के रूप में धरती पर क्यों न आएं, उनकी दिव्यता कभी उनसे अलग नहीं होती। उनके भक्त उन्हें पहचानें या न पहचानें, लेकिन उनका प्रेम और समर्पण उन्हें सदैव भगवान के निकट रखता है। शेषनाग ने जन्म-जन्मांतर तक भगवान की सेवा को ही अपना सौभाग्य माना और कृष्ण ने भी अपने परम सेवक को अपने साथ रखा। इसलिए कृष्ण और शेषनाग की कथा हमें बताती है कि भक्ति का सबसे ऊंचा रूप केवल भगवान से कुछ मांगना नहीं, बल्कि अपने जीवन को उनकी सेवा और धर्म के लिए समर्पित कर देना है।
जब भी आप श्रीकृष्ण के जन्म की वह अद्भुत रात याद करें, तो उस दृश्य को मन में जरूर देखिए। चारों ओर अंधकार है, आकाश से वर्षा हो रही है, यमुना अपने वेग से बह रही है, वासुदेव अपने सिर पर नन्हे कृष्ण को लेकर आगे बढ़ रहे हैं और उनके ऊपर अनंत शेष अपने विशाल फनों से भगवान के लिए छत्र बना रहे हैं। उस रात एक पिता अपने पुत्र को सुरक्षित स्थान तक ले जा रहा था, लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार स्वयं अनंत शेष भी भगवान की सेवा में उनके साथ चल रहे थे। यही है श्रीकृष्ण और शेषनाग की वह दिव्य कथा, जिसमें भगवान, भक्त और प्रकृति तीनों एक ही लीला का हिस्सा बन जाते हैं। जय श्री कृष्ण। अनंत शेष महाराज की जय।