North Indian Pandit in Bay Area California

North Indian Pandit in Bay Area California This page is suitable for devotees living in Bay Area California (United States) and can read Hindi Language. OM SHANTI !!

Contents of this page will be mostly in Hindi language and Priest know Hindi & English. I want to serve and transfer the learning and science behind hindu religion which says "Sarve Bhavantu Sukhinah(May All be Happy)" and "Vasudhaiva Kutumbakam (whole world is one Family)" to my generation and next generation around me. I love explaining why hindu scriptures are so famous and followed by every 4

th human in this planet. Every Pooja starts with SOP, complete understanding of what, why and how and some homework from both side. Let's together make this world a better place for living.

04/01/2026

"हमें अपनी कुलदेवी का कोई अनुमान नहीं है, हम कैसे पता लगाएं?" - यदि आपका भी यही सवाल है, तो यह लेख आपके लिए ही है! 🌺🙏

जय सियाराम! जय माता दी! 🙏

महानगरों की भागदौड़ में यह एक बहुत आम समस्या बन गई है। लेकिन शास्त्रों के अनुसार, जब कोई परिवार अपने कुल देवताओं को भूल जाता है, तो उस कुल का सुरक्षा चक्र टूट जाता है। इसके परिणामस्वरूप जीवन में अचानक बड़े संकट आना, विवाह में अड़चनें, वंश वृद्धि (संतान प्राप्ति) में बाधाएं और घर में बिना कारण की कलह जैसी समस्याएं जन्म लेने लगती हैं।

यदि आप भी अपनी जड़ों से पूरी तरह कट गए हैं और इस उलझन में हैं, तो निराश न हों। सनातन धर्म और ज्योतिष में अपनी 'अज्ञात' कुलदेवी तक पहुँचने के ये अचूक मार्ग बताए गए हैं:

💡 सबसे आसान और अचूक तरीका: मुंडन संस्कार
किसी भी अन्य उपाय से पहले, अपने परिवार के किसी भी सदस्य (चाहे दूर के रिश्तेदार हों) से केवल इतना पूछें कि आपके परिवार में बच्चों का 'पहला मुंडन' (बाल उतारने की रस्म) पीढ़ियों से किस मंदिर या स्थान पर होता आया है? सनातन धर्म में जन्म के बाल हमेशा कुलदेवी या कुलदेवता को ही समर्पित किए जाते हैं। जहाँ आपके परिवार के मुंडन होते हैं, वही आपका वास्तविक दरबार है!

यदि इससे भी बात न बने, तो इन 4 प्रामाणिक मार्गों का अनुसरण करें:

1️⃣ गोत्र और मूल निवास (Ancestral Roots):
भारत में कुलदेवी का सीधा संबंध हमारे 'गोत्र' और 'मूल गाँव' से होता है। अपने परदादाओं के मूल गाँव या ज़िले का पता लगाएं। वहाँ जाकर उसी जाति और गोत्र के अन्य परिवारों से पूछने पर आपकी कुलदेवी का नाम बहुत आसानी से मिल जाएगा, क्योंकि एक गोत्र और क्षेत्र के लोगों की कुलदेवी आमतौर पर एक ही होती हैं।

2️⃣ तीर्थ पुरोहितों की वंशावली (The Divine Record):
यह सबसे प्राचीन तरीका है। हरिद्वार, काशी, प्रयागराज, पुष्कर या त्र्यंबकेश्वर जैसे सिद्ध तीर्थ स्थानों पर हमारे 'तीर्थ पुरोहित' (पंडे) पीढ़ियों का रिकॉर्ड (बही-खाता) रखते हैं। जब आप उन्हें अपना गोत्र और मूल निवास बताते हैं, तो वे अपनी बही खोलकर न सिर्फ आपकी पूरी वंशावली बता देते हैं, बल्कि आपकी कुलदेवी का नाम और उनका मुख्य मंदिर भी स्पष्ट कर देते हैं।

3️⃣ जन्म कुण्डली का 'नवम भाव' (Astrological Code):
आपकी कुण्डली भी आपके पूर्वजों का दर्पण है। कुण्डली का 'नवम भाव' (9th House) धर्म और पूर्वजों का भाव होता है। नवम भाव में बैठे ग्रह या नवमेश की स्थिति से कुलदेवता का पता लगाया जा सकता है।
यदि नवम या पंचम भाव पर चंद्रमा या शुक्र का गहरा प्रभाव है, तो कुल की मुख्य पूजनीय कोई 'देवी' (स्त्री तत्व) हैं।
यदि मंगल या सूर्य का प्रभाव है, तो कुलदेवता (पुरुष तत्व जैसे भैरव जी या सूर्य रूप) की प्रधानता होती है। (इसके सटीक विश्लेषण के लिए आप अपनी कुण्डली दिखा सकते हैं)।

4️⃣ श्रद्धा और संकल्प का मार्ग (Spiritual Surrender):
यदि गोत्र, गाँव या कुण्डली से भी कोई रास्ता न मिले, तो 'संकल्प' ही अंतिम मार्ग है। किसी भी शुभ दिन स्नान के बाद एक पानी वाला नारियल, लाल चुनरी और पान-सुपारी लेकर अपने घर के मंदिर में संकल्प लें:
"हे अज्ञात कुलदेवी माँ! अज्ञानतावश या समय के प्रभाव से हम आपको भूल गए हैं। हम आपका नाम नहीं जानते, लेकिन आप हमारे कुल की अधिष्ठात्री हैं। कृपया हमारा मार्गदर्शन करें और हमें अपने श्री चरणों तक बुला लें।"
सच्चे मन से की गई इस पुकार के बाद, माता अक्सर परिवार के किसी शुद्ध मन वाले सदस्य को स्वप्न में कोई संकेत (जैसे किसी विशेष मंदिर का दृश्य या मूर्ति) अवश्य देती हैं।

📌 तात्कालिक उपाय (Immediate Solution):
जब तक आपको अपनी कुलदेवी का नाम या स्थान पता न चले, तब तक घर के पूजा स्थान पर एक 'सुपारी' पर लाल कलावा लपेटकर उसे ही 'अज्ञात कुलदेवी' मानकर स्थापित कर लें। प्रतिदिन वहाँ एक दीपक जलाएं और क्षमा प्रार्थना करें।

जो अपनी जड़ें ढूंढता है, उसे रास्ता अंततः मिल ही जाता है। अपनी जड़ों से जुड़ें, क्योंकि पेड़ चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो जाए, उसका जीवन उसकी जड़ों में ही बसता है। माता रानी आपके कुल की सदैव रक्षा करें। 🌺🚩

Chaitra Purnima Upavasa on Saturday, April 12, 2025Shukla Purnima Moonrise on Purnima Upavasa Day - 06:29 PM, Apr 11Purn...
04/12/2025

Chaitra Purnima Upavasa on Saturday, April 12, 2025
Shukla Purnima Moonrise on Purnima Upavasa Day - 06:29 PM, Apr 11
Purnima Tithi Begins - 02:51 PM on Apr 11, 2025
Purnima Tithi Ends - 05:21 PM on Apr 12, 2025

Purnima Fasting or Pournami Vratham
Purnima fasting on Chaturdashi occurs only when Purnima starts during Madhyahna period on previous day. It is believed that if Chaturdashi prevails beyond Madhyahna then it pollutes Purnima Tithi and this Chaturdashi day should not be considered for Purnima fasting even if Purnima prevails during evening. There are no two opinions on this rule and DrikPanchang.com lists Purnima fasting days according to this rule.

In North India full moon day is known as Purnima or Poornima. However in South India full moon day is known as Pournami or Pournima and fasting on this day is known as Pournami Vratam. Pournami Vratam is observed from sunrise to till sighting of the moon.

Pournami Fasting days might not be same for two locations. Hence one should set the location before noting down Pournami Vratam dates.

माघ पूर्णिमा की अनेक शुभकामनाएं !
02/11/2025

माघ पूर्णिमा की अनेक शुभकामनाएं !

02/11/2025

पण्डित पंकजराम तिवारी जी के विचारों का प्रसार :

🌷ॐश्रीगणेशायनमः🌷
कुम्भ का विषय ऐतिहासिकता और महत्व
साधु-संत कुंभ क्षेत्र में पहुँच चुके हैं। शास्त्रों में महाकुंभ की महिमा अपार बताई जाती है। यही कारण है कि हर सनातनी अपने जीवन में कम-से-कम एक बार प्रयागराज कुंभ में स्नान ज़रूर करना चाहता है। त्रिवेणी पर सिर्फ स्नान का ही महात्म्य नहीं है, बल्कि अक्षयवट आदि के दर्शन भी महत्वपूर्ण हैं।
कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक एवं सांस्कृतिक समागम है, जो पूर्णत: वैज्ञानिक अवधारणाओं पर आधारित है। खगोल विज्ञान के अनुसार, ग्रह-नक्षत्रों के विशेष सिद्ध में आने के बाद अर्ध कुंभ, पूर्ण कुंभ और महाकुंभ का आयोजन के बारे में सबसे पुरानी लिखित जानकारी चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के यात्रा विवरणों से मिलती है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों में इसके बारे में सृष्टि के प्रारंभ को माना गया है।
अथर्ववेद में कुंभ मेले के वर्णन की बात कही जाती है। अथर्ववेद में ‘चतुर्था ददामि’ और ‘पूर्णा: कुंभोषधिकाल आहितस्तं’ का जिक्र है। हालाँकि, 14वीं-15वीं शताब्दी के विद्वान सायण और 17वीं शताब्दी के विद्वान उद्गीथ बताते हैं कि पहला श्लोक विश्तारी यज्ञ की महिमा में एक भजन से संबंधित है और दूसरा ‘ईश्वरीय समय’ से संबंधित है। यहाँ, कुंभ का अर्थ है ‘पानी का घड़ा’, न कि त्योहार
पुराणों में कुंभ का विस्तार से वर्णन
जो भी हो, लेकिन कुंभ का वर्णन पुराणों में है। मत्स्य पुराण में इसकी कहानी है। जब समुद्र मंथन हुआ तो उसमें से एक रत्न के रूप में अमृत कलश भी निकला। अमृत असुर ना पी जाएँ, इसलिए देवता इसे लेकर भागने लगे और असुर उनका पीछा करने लगे। इस दौरान अमृत की बूँदे प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में गिर गईं। जहाँ-जहाँ अमृत की बूँदे गिरीं, वहाँ-वहाँ आज कुंभ मेले का आयोजन होता है।
ऐसा ही वर्णन स्कंद पुराण एवं पद्म पुराण में है। पद्म पुराण में कहा गया है, “पृथिव्यां कुम्भयोगस्य चतुर्धा भेद उच्चते। चतु:स्थले नितनात् सुधा कुम्भस्थ भूतले।। चन्द्र प्रस्रवणा रक्षां सूर्यों विस्फोटनात् दधौ। दैत्येभ्यश्च गुरु रक्षां सौरिदेवेंद्रजात् भयात्।।” इसका अर्थ हुआ कि पृथ्वी पर कुम्भयोग के चार प्रकार होते हैं। चार स्थानों पर हर समय अमृत (सुधा) का प्रवाह होता है। यहाँ सूर्य और चंद्रमा के माध्यम से रक्षा का प्रवाह होता है।
कुंभ को लेकर स्कंद पुराण में कहा गया है, “माघे मासे गंगे स्नानं यः कुरुते नरः। युगकोटिसहस्राणि तिष्ठंति पितृदेवताः।।” अर्थात, माघ महीने में गंगा में स्नान करने वाले व्यक्ति के पितर स्वर्ग में वास करते हैं। वहीं, पद्म पुराण में कहा गया है, “त्रिषु स्थलेषु यः स्नायात् प्रयागे च पुष्करे। कुरुक्षेत्रे च धर्मात्मा स याति परमं पदम्।।” अर्थात, जो धर्मात्मा प्रयाग, पुष्कर और कुरुक्षेत्र में स्नान करता है वह परम धाम जाता है। गरुण पुराण में कहा गया है, “अग्निष्टोमसहस्राणि वाजपेयशतानि च। कुंभस्नानस्य कलां नार्हंते षोडशीमपि।।” (हजारों अग्निष्टोम और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ भी कुंभ स्नान के सोलहवें भाग के बराबर नहीं हैं।) ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, “प्रयागे माघमासे तु स्नात्वा पार्थिवमर्दनः। सर्वपापैः प्रमुच्येत पितृभिः सह मोदते।।” अर्थात, माघ मास में प्रयाग में स्नान करने से सभी पापों से मुक्त हो जाता है और उसके पितर प्रसन्न होते हैं।
अग्नि पुराण के अनुसार, “कुंभे कुंभोद्भवः स्नात्वा प्रायच्छति हि मानवान्। ततः परं न पापानि तिष्ठन्ति शुभकर्मणाम्।।” अर्थात, कुंभ में स्नान करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और वह शुभ कर्मों की ओर अग्रसर होता है। विष्णु पुराण के अनुसार, “अयं कुंभः परं पुण्यं स्नानं येन कृतं शुभम्। सर्वपापक्षयं याति गच्छते विष्णुसन्निधिम्।।” अर्थात, कुंभ में स्नान अत्यंत पुण्यदायक है
और आदमी विष्णु लोक जाता है।
श्रीमदभागवत पुराण के अनुसार, “तत्रापि यः स्नानकृत् पुण्यकाले। गंगा जलं तीर्थमथाधिवासम्।। पुण्यं लभेत् कृतकृत्यः स गत्वा। वैकुण्ठलोकं परमं समेति।।” अर्थात, पवित्र समय में गंगा में स्नान करने वाला व्यक्ति पुण्य प्राप्त कर वैकुण्ठ धाम जाता है। महाभारत के वन पर्व में कहा गया है, “त्रिपुरं दहते यज्ञः स्नानं तीर्थे तु दहते। सर्वपापं च तीर्थे स्नात्वा सर्वं भवति शुद्धये।।”
अर्थात, यज्ञ तीनों लोकों को शुद्ध करता है, लेकिन तीर्थ में स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति पूरी तरह शुद्ध हो जाता है। कूर्म पुराण में कहा गया है कि कहता है कि
कुंभ स्नान से सारे पाप नष्ट होते हैं।
कुंभ में पापों को नष्ट करने और स्नान को फलदायी बनाने के लिए पाप नहीं करने का भी संकल्प लेना चाहिए।
सम्राट हर्ष के समय चीनी यात्री ने किया जिक्र
मस्त्य पुराण एवं पद्म पुराण के अलावा कुंभ का वर्णन स्कंद पुराण, अग्नि पुराण, भविष्य पुराण, ब्रह्म पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण, भागवत पुराण, विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण और वाल्मीकि रामायण आदि में भी है। मान्यताओं के अनुसार, कुंभ का आयोजन अनादि काल से होता है। वहीं, कुछ इसे सिंधु सभ्यता से भी पुराना बताते हैं। कहा जाता है कि यह हड़प्पा और मोहनजोदड़ो सभ्यता से 1,000 साल पुरानी है। ईसा के जन्म से 500 पूर्व हुए परमार वंश के सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में शामिल रहे कालिदास ने अपनी अमर कृति रघुवंशम में भी इसका जिक्र किया है। सम्राट हर्षवर्धन बैंस, जिन्हें इतिहास में सम्राट हर्ष के नाम भी जानते हैं, के शासनकाल में 629-645 ईस्वी तक भारत में रहे चीनी यात्री ह्वेन त्सांग (या Xuanzang) ने भी कुंभ का वर्णन किया है। मुगल काल में इसको लेकर कई जगह वर्णन है।
यह माना जाता है कि अधिकतर पुराण बाद के काल में लिखे गए हैं। कई तो 15-16वीं सदी में भी लिखे गए। कुछ धर्मग्रंथों में कहा गया है कि सबसे पहले कुंभ मेले का आरंभ सम्राट हर्षवर्धन ने किया था। ह्वेन त्सांग अपनी यात्रा के दौरान प्रयागराज आया था और उसने अपनी यात्रा वृतांत में लिखा है कि सम्राट हर्षवर्धन हर पाँच साल पर नदियों के संगम पर आयोजन करते थे और वहाँ गरीबों को दान देते थे।
अक्षयवट का महात्म्य, सीएम योगी ने मुगलकाल के प्रतिबंध हटाए
कहा जाता है कि प्रयागराज कुंभ में स्नान का फल तभी मिलता है, जब वहाँ स्थित अक्षयवट का दर्शन किया जाए। संगम तट पर एक प्राचीन किला है, जिसमें यह अक्षय वट स्थित है। अक्षयवट का जिक्र पुराणों में भी वर्णन है। कहा जाता है कि यह वट सृष्टि के विकास और प्रलय का साक्षी रहा है। इसका कभी नाश नहीं होता है। अकबर ने अक्षयवट के दर्शन-पूजन पर रोक लगा दी थी।
इसके बाद दिवंगत सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने यहाँ आकर पातालपुरी मंदिर का दर्शन किया था और
योगी आदित्यनाथ ने साल 2018 में यहाँ आम लोगों के दर्शन पर से प्रतिबंध हटा दिया था। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी यहाँ आए और इस अनादि अक्षयवट का दर्शन किया था।
इस वट को बारे में कहा जाता है कि इस वृक्ष को माता सीता ने आशीर्वाद दिया था कि प्रलय काल में जब धरती जलमग्न हो जाएगी और सब कुछ नष्ट हो जाएगा तब भी वह हरा-भरा रहेगा। इसके अलावा, एक मान्यता यह भी है कि बाल रूप में भगवान कृष्ण इसी वट वृक्ष पर विराजमान हुए थे। तब से श्रीहरि इसके पत्ते पर शयन करते हैं। पद्म पुराण में अक्षयवट को तीर्थराज प्रयाग का छत्र कहा गया है।
ह्वेन त्सांग ने अक्षयवट के बारे में लिखा है कि नगर में एक मंदिर है और उसमें एक विशाल वट है। इसकी शाखाएँ और पत्तियाँ दूर दूर तक फैली हुई हैं। इस वट का वर्णन वाल्मीकि रामायण में भी मिलता है। कहा जाता है कि भारद्वाज मुनि ने भगवान श्रीराम से कहा था कि वे दोनों भाई गंगा-यमुना के संगम पर जाएँ और वहाँ बहुत बड़ा वट वृक्ष मिलेगा। वहीं, से दोनों भाई यमुना को पार कर जाएँ।
भारद्वाज मुनि अक्षयवट के बारे में भगवान राम से कहते हैं कि वह चारों तरफ से दूसरे वृक्षों से घिरा होगा। उसकी छाया में बहुत से सिद्ध पुरुष रहते होंगे। वहाँ पहुँचकर वटवृक्ष से आशीर्वाद की कामना करनी चाहिए। कहा जाता है माता सीता ने ऐसा ही किया और साथ ही अक्षयवट को आशीर्वाद दिया कि संगम स्नान करने के बाद जो कोई अक्षयवट का पूजन-दर्शन करेगा, उसे ही स्नान का फल मिलेगा।
कहा जाता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि के आरंभ में प्रयागराज के संगम पर यज्ञ आरंभ किया था। इसमें भगवान विष्णु यजमान बने थे और भगवान शिव देवता बने थे। यज्ञ के अंत में तीन देवों ने अपनी शक्तिपुँज से एक वृक्ष उत्पन्न किया, जिसे आज अक्षयवट कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस वटवृक्ष की उम्र 5270 वर्ष बताई जाती है। कहा जाता है कि इस अक्षयवट की जड़े पाताल लोक में स्थित हैं।
कहा जाता है कि अक्षयवट को मुगलकाल में इसे खत्म करने के प्रयास किए गए। इसके अलावा भी कई मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इसे काट एवं जलाकर नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे। माना जाता है कि इस तरह के वट वृक्ष पृथ्वी पाँच हैं। पहला प्रयागराज में अक्षयवट, दूसरा उज्जैन में सिद्धवट, तीसरा वृंदावन में वंशीवट, चौथा गया में मोक्षवट और पाँचवाँ पंचवटी में
कब आयोजित होता है महाकुंभ, कुंभ और अर्धकुंभ
इस बार प्रयागराज में 144 साल बाद लगने वाला कुंभ लग रहा है। दरअसल, कुंभ पाँच प्रकार का होता है- महाकुंभ, पूर्ण कुंभ, अर्ध कुंभ, कुंभ और माघ कुंभ, जिसे माघ मेला भी कहते हैं। 144 बाद लगने वाले महाकुंभ का आयोजन सिर्फ प्रयागराज के संगम पर ही होता है। शास्त्रों के अनुसार, जब बृहस्पति वृषभ राशि में और सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयागराज में किया जाता है।
पूर्ण कुंभ 12 वर्षों में आयोजित किया जाता है। पूर्ण कुंभ का आयोजन 4 तीर्थस्थलों- हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज में होता है। हरिद्वार गंगा नदी, उज्जैन शिप्रा नदी, नासिक गोदावरी और प्रयागराज गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदियों के संगम पर बसा है। जब सूर्य मेष राशि और बृहस्पति कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं, तब कुंभ मेले का आयोजन हरिद्वार में किया जाता है। .
वहीं, अर्ध कुंभ का आयोजन हर 6 साल पर होता है। इसका आयोजन केवल दो स्थानों- प्रयागराज और हरिद्वार में होता है। माघ कुंभ हर साल सिर्फ प्रयागराज में आयोजित किया जाता है। जब सूर्य सिंह राशि में प्रवेश करते हैं तो उज्जैन में जो कुंभ मनाया जाता है उसे सिंहस्थ कुंभ कहते हैं। जब सूर्य और बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, तब यह कुंभ मेला नासिक में मनाया जाता है

08/18/2024

In California. Poornima Starts 2:35 PM on Sunday 18th and ends on 11:35 AM on Monday 19th August 2024
Happy Rakhi !!

08/18/2024

Bhadra is in Pataal.
Celebrate Rakshabandhan whenever you want.
Happy Raksha Bandhan !

Partial (30%) Solar Eclipse for California. Partial Solar Eclipse in San JoseEclipse Start Time - 10:12 AMMaximum Eclips...
02/23/2024

Partial (30%) Solar Eclipse for California.

Partial Solar Eclipse in San Jose
Eclipse Start Time - 10:12 AM
Maximum Eclipse Time - 11:12 AM
Eclipse End Time - 12:16 PM
Partial Eclipse Duration - 02 Hours 03 Mins 16 Secs
Maximum Magnitude - 0.46
Sutak Begins - 10:23 PM, Apr 07
Sutak Ends - 12:16 PM
Sutak for Kids, Old and Sick Begins - 06:42 AM
Sutak for Kids, Old and Sick Ends - 12:16 PM

Partial Solar Eclipse in Santa ClaraOct 14thEclipse Start Time - 08:05 AMMaximum Eclipse Time - 09:19 AMEclipse End Time...
10/06/2023

Partial Solar Eclipse in Santa Clara
Oct 14th

Eclipse Start Time - 08:05 AM
Maximum Eclipse Time - 09:19 AM

Eclipse End Time - 10:42 AM
Partial Eclipse Duration - 02 Hours 37 Mins 13 Secs

Sutak Begins - 06:34 PM, Oct 13
Sutak Ends - 10:42 AM

Sutak for Kids, Old and Sick Begins - 04:05 AM
Sutak for Kids, Old and Sick Ends - 10:42 AM

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