20/09/2026
“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥”
— कबीरदास
. आज जब 99% इंसान डिस्ट्रैक्ट है, अपने काम की जगह दूसरों के कामों में ताका झांकी, साथ में चापलूसी करना एक पेशा...जैसे नौकरी में 9 काम होता है और दसवां काम "हांजी" यानि चापलूसी करना....और वह इंसान महंगाई के ट्रैप में फंस जाता है।
उसकी आय भी बढ़ती है साथ में महंगाई भी... उसके समानांतर उसके खर्चे...एक समय आता है जब आय बढ़नी बंद हो जाती है, लेकिन महंगाई और उसके खर्चे बढ़ते रहते है... ज्यादातर इंसान इस ट्रैप को , जीवन के इस ट्रैप को, स्वीट पॉयजन को...समझ नहीं पाते है।
. आज से 500 साल पहले की लिखी हुई चंद पंक्तियों को पढ़कर हम आत्मसात कर ले, निंदा और धैर्य.. दोनों को आज के परिवेश में समावेशी तरीके से समझकर.. अर्थ में ढाल बनाकर आगे बढ़े तो...मुझे लगता है कि जो इंसान 99% डिस्ट्रैक्ट है उसका प्रतिशत कम हो सकता है।
. यात्राएं हमेशा हमें अलग अलग इंसानों से पहचान करवाती है, कुछ अनजान लोग सफर का साथी बन जाते है, जीवन के कदमताल में कुछ कदम उनके भी साथ मिला जाता है....लेकिन जीवन का कटु सत्य यही है कि यह सफर हमे अकेले ही तय करना होता है..।
आज जब इंसान का स्वभाव इस्तेमाल करना या इस्तेमाल होना हो चुका है, लोग पहले से धारणा बना लेते है और सीढ़ी की तरह ..या तो इस्तेमाल होते है अथवा करते है।
.अब सबसे बड़ी सीख लेनी चाहिए "निंदा" और "धैर्य" से.. इन दोनों शब्दों में डिस्ट्रैक्शन से दूर होने का भाव छिपा है। अपनी तुलना किसी से न करे, जीवन को कल पर न छोड़े...कुछ पैसे बचाकर घूमने निकल जाएं.... इस धरती से खाली हाथ ही जाना है.... सात पुश्तों के लिए धन इकट्ठा करने से बेहतर है .. पुश्त की नींव मजबूत करे।
बिना #स्वरोजगार इस महंगाई, खर्चे और आय को तुलना करके...आगे बढ़ना मुश्किल है। कुछ धार्मिक तो कुछ एतिहासिक यात्राओं का आनंद ले... यात्रा पर निकले यही जीवन है। जैसे जैसे उम्र बढ़े... जीवन में अनुभव से आनंद बढ़ते रहना चाहिए।
हर हर महादेव।